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नागोया प्रोटोकॉल: भारत का वैश्विक दबदबा: नागोया प्रोटोकॉल के तहत अनुपालन प्रमाणपत्र जारी करने में भारत बना विश्व गुरु, वैश्विक स्तर पर 56 प्रतिशत हिस्सेदारी

मानवेन्द्र जैतावत · 31 मार्च 2026, 02:59 दोपहर
भारत ने नागोया प्रोटोकॉल के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अनुपालन प्रमाणपत्र (आईआरसीसी) जारी करने में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया है। दुनिया भर में जारी कुल प्रमाणपत्रों में से आधे से अधिक अकेले भारत द्वारा जारी किए गए हैं जो इसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

नई दिल्ली | नागोया प्रोटोकॉल ऑन एक्सेस एंड बेनिफिट-शेयरिंग (एबीएस) के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अनुपालन प्रमाणपत्र (आईआरसीसी) जारी करने में भारत एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत ने विश्व स्तर पर जारी किए गए सभी प्रमाणपत्रों में से 56 प्रतिशत से अधिक अकेले ही जारी किए हैं। यह उपलब्धि भारत के जैविक संसाधनों के संरक्षण और उनके न्यायसंगत उपयोग के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाती है।

वैश्विक मंच पर भारत का दबदबा

एबीएस क्लियरिंग-हाउस के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में अब तक कुल 6,311 आईआरसीसी प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। इनमें से 3,561 प्रमाणपत्र अकेले भारत द्वारा जारी किए गए हैं। यह संख्या भारत को नागोया प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन में अन्य सभी देशों से बहुत आगे रखती है। पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने वाले इस वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका अब सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

अन्य देशों की तुलना में भारत की स्थिति

वर्तमान में एबीएस क्लियरिंग-हाउस में 142 देश पंजीकृत हैं, लेकिन केवल 34 देशों ने ही अब तक आईआरसीसी जारी किए हैं। भारत के बाद फ्रांस 964 प्रमाणपत्रों के साथ दूसरे स्थान पर काबिज है। इसके बाद सूची में स्पेन (320), अर्जेंटीना (257), पनामा (156) और केन्या (144) का स्थान आता है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत जैविक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के निष्पक्ष उपयोग के मामले में दुनिया का सफल नेतृत्व कर रहा है।

क्या है आईआरसीसी और नागोया प्रोटोकॉल?

नागोया प्रोटोकॉल के तहत, आनुवंशिक संसाधनों और संबंधित पारंपरिक ज्ञान तक पहुंच प्रदान करने वाले देशों के लिए आईआरसीसी जारी करना अनिवार्य है। यह एक आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय प्रमाण के रूप में कार्य करता है। यह प्रमाणपत्र सुनिश्चित करता है कि संसाधनों के उपयोगकर्ताओं और प्रदाताओं के बीच पूर्व सूचित सहमति (PIC) प्राप्त कर ली गई है। साथ ही दोनों पक्षों के बीच पारस्परिक रूप से सहमत शर्तें (MAT) भी स्थापित हो गई हैं।

भारत की सफलता का मुख्य कारण

भारत की इस अग्रणी स्थिति का मुख्य श्रेय जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रभावी कार्यान्वयन को जाता है। इसके लिए देश में एक अत्यंत मजबूत और पारदर्शी त्रि-स्तरीय संस्थागत ढांचा तैयार किया गया है। इसमें राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियां सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं।

भविष्य की राह और वैश्विक प्रभाव

सुव्यवस्थित प्रक्रियाओं और डिजिटल तंत्रों ने आवेदनों के कुशल प्रसंस्करण को संभव बनाया है। यह उपलब्धि वैश्विक जैव विविधता प्रबंधन में भारत की सक्रिय भूमिका और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयासों को रेखांकित करती है। भारत के ये निरंतर प्रयास जैविक संसाधनों से प्राप्त लाभों के निष्पक्ष और समान वितरण को बढ़ावा देते हैं। यह अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों और वैश्विक पर्यावरण समझौतों के पूर्ण अनुपालन की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह उपलब्धि न केवल भारत के लिए गर्व की बात है, बल्कि यह दुनिया के अन्य विकासशील देशों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण पेश करती है। भारत अब वैश्विक जैव विविधता नीतियों का प्रमुख केंद्र बन गया है।

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