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रुपये की अनकही दास्तां: 'मुझे डॉलर के नहीं, चुनाव आयोग के मुक़ाबले देखो' - रुपये ने देश के नाम लिखी एक भावुक और तीखी चिट्ठी

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रवीश कुमार के इस लेख में भारतीय रुपया अपनी व्यथा सुना रहा है। वह अपनी गिरती कीमत, नोटबंदी के डर और चुनावों में अपनी भूमिका पर तीखा कटाक्ष करता है।

HIGHLIGHTS

  • भारतीय रुपया अब डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर तक पहुँचने की कगार पर पहुँच गया है।
  • नोटबंदी के बाद से रुपया '8 PM' के नाम से और प्रधानमंत्री के अचानक फैसलों से डरा हुआ है।
  • चुनावों में 30,000 करोड़ रुपये बांटकर वोट हासिल करने का खेल रुपये की अहमियत बढ़ा देता है।
  • रुपये ने कहा कि वह कमज़ोर नहीं हुआ, बल्कि उसे पाकर वोट देने वाले लोग और लोकतंत्र कमज़ोर हुए हैं।
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नई दिल्ली | पत्रकार रवीश कुमार ने एक बार फिर अपने चिर-परिचित अंदाज़ में देश की आर्थिक स्थिति पर कड़ा प्रहार किया है। इस बार उन्होंने भारतीय रुपये को एक जीवित पात्र बनाकर उसकी आवाज़ को जनता तक पहुँचाया है। रुपया कहता है कि उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक डॉलर के सामने उसकी कीमत 95 तक पहुँच जाएगी। वह खुद को कमज़ोर कहे जाने पर दुखी है।

मज़बूत सरकार और कमज़ोर रुपया

रुपये का मानना है कि उसकी कमज़ोरी को ढाल बनाकर एक मज़बूत सरकार सत्ता में आई थी। विडंबना यह है कि सरकार तो मज़बूत होती गई, लेकिन रुपया हर दिन कमज़ोर होता चला गया। जब यह सरकार आई थी, तब डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 62 थी। आज यह 95 के करीब है। रुपया कहता है कि इसमें उसका दोष नहीं, बल्कि उन लोगों का है जो डॉलर कमा नहीं सके। विदेशी निवेशक अपना पैसा लेकर देश से बाहर जा रहे हैं, जिससे रुपये की कमर टूट रही है। सरकार डॉलर को रोकने में नाकाम रही है, जिसका खामियाजा मुद्रा को भुगतना पड़ रहा है।

डॉक्टर, दवा और डोलो का खेल

रुपये ने अपनी सेहत का ज़िम्मा वित्त मंत्री और आरबीआई गवर्नर पर छोड़ा है। वह उन्हें अपना डॉक्टर मानता है जो कॉलेस्ट्रॉल बढ़ने पर मार्केट में डॉलर का इंजेक्शन लगाते हैं। रुपया व्यंग्य करता है कि जब उसकी कंपकंपी बढ़ती है, तो वह 'डोलो' ले लेता है। डोलो के असर तक वह डॉलर के सामने तनकर खड़ा रहता है, फिर दोबारा लचक जाता है।

8 बजे का खौफ और नोटबंदी

रुपये को विदेशी ताकतों से उतना डर नहीं लगता, जितना कि रात के 8 बजने से लगता है। उसे 2016 की वह रात याद है जब उसे रातों-रात अमान्य घोषित कर दिया गया था। नोटबंदी के बाद रुपया खोया-खोया रहने लगा है। वह देखता है कि सारा चंदा अब एक ही दिशा में जा रहा है। वह सहमा हुआ है कि कब दोबारा उसे बंद करने का फरमान आ जाए।

चुनावों में रुपये की असली भूमिका

रुपया कहता है कि वह बेकार नहीं है। चुनाव के समय उसकी अहमियत बढ़ जाती है। इस चुनाव में भी लगभग 30,000 करोड़ रुपये बांटे जाने की संभावना है। रुपये को बांटकर वोट खरीदे जाते हैं। वह वोटर के खाते में पहुँचकर चुनावी नतीजे बदल देता है। रुपया कहता है कि उसे डॉलर के बजाय चुनाव आयोग के चश्मे से देखा जाना चाहिए।

वोटर की कमज़ोरी

लेख के अंत में रुपया एक कड़वा सच उजागर करता है। वह कहता है कि असल में वह कमज़ोर नहीं हुआ है, बल्कि उसे पाकर वोट देने वाले लोग और लोकतंत्र कमज़ोर हुए हैं। रुपया तो बस एक कागज़ का टुकड़ा है, असली ताकत जनता की थी जो अब चंद नोटों के बदले बिक रही है। वह लोगों को अपनी चिंता करने की सलाह देता है। यह लेख न केवल बढ़ती महंगाई और गिरते रुपये पर कटाक्ष है, बल्कि यह हमारी चुनावी व्यवस्था की खामियों को भी बड़ी बेबाकी से उजागर करता है।

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