नई दिल्ली | “बस एक और… आखिरी एपिसोड” यह सोचकर हम अक्सर टीवी या मोबाइल पर बिंज वॉचिंग करने लगते हैं। दिनभर की थकान के बाद मनोरंजन जरूरी लगता है, लेकिन कब एक एपिसोड घंटों में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता।
इसका सबसे बुरा नतीजा यह होता है कि हमारी नींद पूरी नहीं हो पाती। अगले दिन शरीर में सुस्ती और दिमाग में भारीपन बना रहता है। अगर यह रूटीन लंबे समय तक जारी रहे तो यह आपके शरीर और ब्रेन दोनों को बीमार कर सकता है।
हाल ही में ‘यूरोपियन साइकिएट्री जर्नल’ में एक चौंकाने वाली स्टडी पब्लिश हुई है। इस स्टडी के मुताबिक, अगर रोजाना टीवी देखने का समय थोड़ा भी कम किया जाए तो डिप्रेशन का रिस्क काफी हद तक कम हो सकता है।
क्या टीवी देखने से बढ़ता है मानसिक तनाव?
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक नेगेटिव, हिंसक या हाई-ड्रामा कंटेंट देखने से हमारा ब्रेन लगातार अलर्ट मोड में रहता है। इससे शरीर में स्ट्रेस हॉर्मोन रिलीज होने लगते हैं।
जब दिमाग शांत नहीं होता, तो नींद की क्वालिटी खराब हो जाती है। धीरे-धीरे यह आदत चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान को जन्म देती है। यही कारण है कि ज्यादा टीवी देखना तनाव का बड़ा कारण बन रहा है।
स्टडी के हैरान करने वाले आंकड़े
यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन के रिसर्चर्स ने 65 हजार से ज्यादा लोगों पर 4 साल तक रिसर्च की। इसमें पाया गया कि टीवी देखने के समय और डिप्रेशन के बीच सीधा संबंध है।
रिसर्च के अनुसार, रोज 1 घंटा टीवी कम देखने से डिप्रेशन का जोखिम 11% कम होता है। वहीं, अगर कोई 2 घंटे कम टीवी देखे, तो यह जोखिम 40% तक घट सकता है।
यह प्रभाव सबसे ज्यादा 40 से 65 साल के लोगों में देखा गया है। रिसर्चर्स का मानना है कि स्क्रीन टाइम कम करने से मानसिक स्थिरता बढ़ती है और व्यक्ति अधिक ऊर्जावान महसूस करता है।
नींद और ब्रेन पर बुरा असर
टीवी और मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी हमारे ब्रेन को भ्रमित करती है। यह रोशनी दिमाग को सिग्नल देती है कि अभी दिन है, जिससे स्लीप हॉर्मोन मेलाटोनिन का उत्पादन कम हो जाता है।
मेलाटोनिन कम होने से नींद देर से आती है और बॉडी क्लॉक बिगड़ जाती है। नींद की कमी सीधे तौर पर एंग्जाइटी और डिप्रेशन के जोखिम से जुड़ी हुई है, जो लंबे समय में घातक हो सकती है।
फिजिकल हेल्थ पर पड़ता है प्रभाव
ज्यादा टीवी देखने का मतलब है फिजिकल एक्टिविटी में भारी कमी। जब हम घंटों एक जगह बैठे रहते हैं, तो हमारा मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और वजन बढ़ने लगता है।
शारीरिक सक्रियता कम होने से शरीर में ‘फील-गुड’ केमिकल्स जैसे डोपामिन और सेरोटोनिन का स्तर गिर जाता है। यह स्थिति व्यक्ति को उदासी और अकेलेपन की ओर धकेलती है।
मंचिंग और मूड स्विंग्स का कनेक्शन
अक्सर लोग टीवी देखते हुए चिप्स या जंक फूड खाते हैं, जिसे ‘मंचिंग’ कहा जाता है। जंक फूड खाने से शरीर में अचानक इंसुलिन बढ़ता है और शुगर लेवल तेजी से नीचे गिरता है।
जब शुगर लेवल गिरता है, तो ब्रेन को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिलती। इससे थकान और मूड डाउन होने लगता है। बार-बार होने वाले ये मूड स्विंग्स धीरे-धीरे डिप्रेशन का रूप ले सकते हैं।
कैसे छुड़ाएं टीवी देखने की लत?
अगर आपको लगता है कि टीवी देखना आपके कंट्रोल से बाहर है, तो इसे धीरे-धीरे कम करें। सबसे पहले 30 दिन का ‘नो टीवी चैलेंज’ लें और अपने केबल या ओटीटी सब्सक्रिप्शन को कुछ समय के लिए बंद करें।
टीवी को ऐसी जगह रखें जहां वह आसानी से न दिखे। जब टीवी सामने नहीं होगा, तो उसे देखने का विचार भी कम आएगा। खाली समय में रीडिंग कॉर्नर बनाएं या कोई नई हॉबी शुरू करें।
घर में ‘नो-स्क्रीन नियम’ लागू करें, खासकर खाना खाते समय और सोने से एक घंटे पहले। छोटे-छोटे कदम उठाकर आप न केवल अपनी आंखों को बचा सकते हैं, बल्कि अपने मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बना सकते हैं।