विवाद की मुख्य जड़ वह नई सिफारिश है जिसमें केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला के रूप में मान्यता देने की बात कही गई है। यह प्रस्ताव केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेष समिति द्वारा दिया गया था, जिसे नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने स्वीकार किया था। हालांकि, इस नए मानदंड ने एक बड़ा कानूनी और पर्यावरणीय पेच फंसा दिया है। इससे पहले 1985 से चले आ रहे प्रसिद्ध गोदावर्मन और एमसी मेहता मामलों में अरावली को एक विस्तृत और अखंड भौगोलिक इकाई के रूप में संरक्षण प्राप्त था, जिसमें ऊंचाई का कोई बंधन नहीं था।
पर्यावरणविदों की चिंता और संभावित पारिस्थितिक आपदा
राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न हिस्सों में इस नई परिभाषा के खिलाफ विरोध की लहर दौड़ गई है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि 100 मीटर से छोटी पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से बाहर करना उन्हें सीधे तौर पर खनन माफियाओं और अनियंत्रित शहरीकरण के हवाले करने जैसा है। विशेषज्ञों का तर्क है कि छोटी पहाड़ियां मुख्य पर्वत श्रृंखला के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती हैं। यदि इनमें खनन की अनुमति मिलती है, तो यह न केवल अरावली के भौतिक स्वरूप को नष्ट कर देगा बल्कि पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को भी अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा।
केंद्र सरकार का स्पष्टीकरण और खनन पर प्रतिबंध
जैसे-जैसे विवाद गहराता गया, केंद्र सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए सक्रियता दिखाई है। केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हाल ही में एक आधिकारिक बयान जारी कर अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पूरी अरावली श्रृंखला में अब कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जाएगा। केंद्र का कहना है कि नई परिभाषा को लेकर कुछ हलकों में गलतफहमी फैलाई जा रही है और सरकार का प्राथमिक उद्देश्य अरावली की रक्षा करना ही है। यह प्रतिबंध राजस्थान और हरियाणा सहित उन सभी राज्यों पर लागू होगा जहां से यह पर्वतमाला गुजरती है।
विपक्षी दलों का कड़ा रुख और राजनीतिक सरगर्मी
इस मुद्दे पर राजनीति भी गरमा गई है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेता जयराम रमेश सहित कई विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार के दावों पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि केंद्र के नए आदेश में कुछ भी मौलिक नहीं है। उनका आरोप है कि सरकार ने ऐसी स्थिति ही क्यों पैदा होने दी जिससे अरावली के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा। विपक्ष का मुख्य मुद्दा यह है कि अरावली की अखंडता के साथ कोई भी समझौता भविष्य की पीढ़ियों के लिए आत्मघाती होगा।
अरावली का भौगोलिक महत्व और राजस्थान पर प्रभाव
अरावली पर्वतमाला का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान के विभिन्न जिलों जैसे अलवर, जयपुर, अजमेर, राजसमंद और उदयपुर से होकर गुजरता है। यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और उत्तर भारत के लिए एक महत्वपूर्ण जलवायु नियंत्रक की भूमिका निभाती है। यह थार मरुस्थल के रेतीले तूफानों को दिल्ली और गंगा के मैदानों तक पहुंचने से रोकने के लिए एक प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी है। यदि अरावली की पहाड़ियां नष्ट होती हैं, तो राजस्थान के शहरों में धूल भरी आंधियों का प्रकोप बढ़ जाएगा और जल स्तर में भारी गिरावट आएगी।
कानूनी लड़ाई और आरपी बलवान की याचिका
सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान के अलावा, हरियाणा वन विभाग के पूर्व अधिकारी आरपी बलवान ने भी इस मामले में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की है। उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की उन सिफारिशों को चुनौती दी है जो पहाड़ियों के वर्गीकरण को बदलती हैं। उनकी याचिका पर कोर्ट ने पहले ही केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस भेजकर उनका पक्ष मांगा है। अब सोमवार की सुनवाई में इन सभी पहलुओं को एक साथ जोड़कर देखा जाएगा। अदालत का यह फैसला न केवल अरावली के लिए बल्कि देश में पर्यावरण संरक्षण के कानूनी सिद्धांतों के लिए भी एक मिसाल बनेगा।