नई दिल्ली | अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और उसकी भौगोलिक परिभाषा को लेकर छिड़ा विवाद अब एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट की वैकेशन बेंच आज इस महत्वपूर्ण मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई करने जा रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस विशेष बेंच में जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल हैं। यह मामला सीजेआई की वैकेशन कोर्ट में पांचवें नंबर पर सूचीबद्ध किया गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस सुनवाई के दौरान केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के उद्देश्य से नए और कड़े निर्देश जारी हो सकते हैं।
विवाद की मुख्य वजह और नई परिभाषा का असर
दरअसल यह पूरा विवाद तब गहराया जब सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा दी गई सिफारिश को स्वीकार कर लिया था। इस नए सुझाव के मुताबिक केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत श्रृंखला का आधिकारिक हिस्सा माना जाएगा। अरावली का यह कानूनी मामला साल 1985 से चल रहा है और पूर्व में गोदावर्मन और एम.सी. मेहता मामले में इस पर्वत श्रृंखला को व्यापक सुरक्षा प्रदान की गई थी। अब नई परिभाषा आने से राजस्थान और हरियाणा के पर्यावरणविदों में भारी रोष व्याप्त है।