धनखड़ का चौटाला परिवार से रिश्ता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी रहा। ओपी चौटाला के निधन पर उन्होंने कहा था—“आज मैं जो हूं, उसका निर्णय चौधरी साहब ने किया था।” यहां तक कि उनके बेटे के निधन पर चौटाला परिवार जयपुर पहुंचा। यही वजह है कि जब उन्होंने उपराष्ट्रपति आवास छोड़ा, तो अभय चौटाला ने उन्हें अपने छतरपुर फार्महाउस में स्वागत करते हुए कहा—“यह घर आपका ही है।”
इस्तीफे से उठे सवाल
धनखड़ का कार्यकाल 2027 तक था, लेकिन उन्होंने अचानक 21 जुलाई को इस्तीफा दे दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें ‘हाउस अरेस्ट’ किया गया था, जबकि सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया। 41 दिन बाद जब उन्होंने आवास खाली किया तो सीधे छतरपुर बंगले पहुंचे। सवाल यही उठता है—क्या यह महज़ स्वास्थ्य कारण था या फिर किसी बड़े राजनीतिक खेल का हिस्सा?
जाट राजनीति पर असर
हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी यूपी और दिल्ली की राजनीति में जाट समुदाय अहम भूमिका निभाता है। भाजपा के लिए यह वोट बैंक हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। ऐसे में धनखड़ की विदाई और चौटाला परिवार से उनकी नज़दीकियां भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या धनखड़ अब जाट राजनीति के नए ध्रुव बन सकते हैं।
विवादों में रहा उपराष्ट्रपति कार्यकाल
धनखड़ अपने कार्यकाल में लगातार सुर्खियों में रहे। ममता बनर्जी सरकार पर तीखे हमले से लेकर संविधान की प्रस्तावना को लेकर बयान तक, उन्होंने कई बार विवादों को जन्म दिया। यहां तक कि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भी लाया गया—जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अभूतपूर्व था।
भविष्य की सियासत और चौटाला फैक्टर
अभय चौटाला ने हाल ही में कहा—“मैं धनखड़ में ताऊ देवीलाल की छवि देखता हूं।” यह बयान साफ इशारा करता है कि धनखड़ अब चौटाला परिवार के ‘राजनीतिक परिवार’ का हिस्सा माने जा रहे हैं। ऐसे में आने वाले चुनावों में यह समीकरण भाजपा के लिए नई चुनौती बन सकता है।
बड़ा सवाल
अब राजनीति के गलियारों में यही चर्चा है—
क्या धनखड़ को चौटाला परिवार के जरिए जाट राजनीति में नया रोल दिया जा रहा है?
और क्या छतरपुर का यह बंगला उत्तर भारत की राजनीति का नया केंद्र बनने जा रहा है?
फिलहाल, इन सवालों का जवाब आने वाला वक्त ही देगा। लेकिन इतना तय है कि दिल्ली से लेकर जयपुर और सिरसा तक की निगाहें अब इस बंगले पर टिक गई हैं।