नंदकिशोर आचार्य ने साहित्य को मनुष्य की स्वयं को परखने की प्रक्रिया बताया। उनके अनुसार, आत्म की खोज ही साहित्य का मूल बीज है।
उन्होंने समाज में साहित्य के प्रति बढ़ती उदासीनता पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने यह भी कहा कि लेखक सबसे पहले अपने लिए लिखता है, अपने भीतर की आवाज को सुनने के लिए।
यदि मानव जीवन में संवेदना और आत्मीयता को बचाए रखना है, तो साहित्य और कलाएँ ही वह मार्ग हैं। इन्हीं पर चलकर मनुष्य अपने आत्म से परे जाकर सोच सकता है।
साहित्यिक आयोजन: समाज की जीवंतता का परिचायक
पत्रकारिता यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति ओम थानवी ने साहित्यिक आयोजनों को समाज की जीवंतता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य के साथ अन्य कलाओं को जोड़ना इस आयोजन की मौलिक उपलब्धि है।
उन्होंने साहित्यिक परिदृश्य में फैलती गुटबाजी और एक तरह के जातिवाद पर खेद व्यक्त किया। थानवी ने जोर दिया कि वैचारिक भिन्नता के बावजूद भी श्रेष्ठ लेखन संभव है, और यहीं से नए स्वर उत्पन्न होते हैं।
शब्दों की शक्ति और बौद्धिक क्रांति
पूर्व आईएएस पवन अरोड़ा ने साहित्य को समाज की आत्मा के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने बताया कि विचारों के टकराव से ही बौद्धिक क्रांति का जन्म होता है।
शब्द मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं, और यह महोत्सव उसी शक्ति की पहचान का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की आत्मा भावनाओं से पुष्ट होती है, तकनीक से नहीं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में युवाओं के लिए साहित्य एक नया दृष्टिकोण और आलोचनात्मक विवेक विकसित करता है।
कला और संस्कृति का क्षरण: एक गंभीर चिंता
सुप्रसिद्ध कथक गुरु प्रेरणा श्रीमाली ने कला और संस्कृति के क्षरण पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हम ऐसे दौर में हैं जहाँ नैतिक मूल्य लगभग विलुप्त हो रहे हैं और धैर्य क्षीण होता जा रहा है।
सभ्यताएँ स्थायी हो सकती हैं, पर संस्कृति निरंतर परिवर्तनशील और गतिशील रहती है। उसके मूल में कला, लोक परंपराएँ और चिंतन ही होते हैं।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि राजस्थान में शास्त्रीय कलाओं का स्थान लगातार सिमटता जा रहा है। जबकि कला ही जीवन की दृष्टि बदलने का सामर्थ्य रखती है।
साहित्य की आवश्यकता और विचारों का पतन
फेस्टिवल के निदेशक अशोक राही ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न से अपनी बात शुरू की। उन्होंने पूछा, “क्या सचमुच इस समाज को अभी भी साहित्य की आवश्यकता है?”
उन्होंने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार भाषा है, पर आज के समय में सबसे तेजी से नष्ट होता तत्व विचार है। जब समाज साहित्य से विमुख हो जाता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है।
इसी पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध छायाकार सुधीर कासलीवाल ने कहा कि रंगमंच और साहित्य हमारी आत्मा के दर्पण हैं।
प्रेस क्लब के अध्यक्ष मुकेश मीणा ने इस आयोजन को ‘साहित्य का महाकुंभ’ कहकर संबोधित किया।
नई पीढ़ी और बदलती पढ़ने की आदतें
फेस्टिवल में 'नई पीढ़ी क्या पढ़ना चाहती है?' विषय पर आयोजित सत्र विशेष रूप से चर्चित रहा। वरिष्ठ लेखक डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि यह धारणा पूरी तरह गलत है कि आज की जेन-जी पीढ़ी पढ़ती नहीं।
उनके पढ़ने के माध्यम बदल गए हैं। ई-बुक्स, किंडल, ऑडियो बुक्स और पॉडकास्ट ने पढ़ने को एक नई दिशा दी है।
उन्होंने कहा कि आज के युवा मोटे उपन्यासों से बचते हैं, क्योंकि उनकी प्राथमिकताओं में करियर पहले स्थान पर है।
दुनिया 'इवेंट' में बदली, AI से खतरा नहीं: यशवंत व्यास
संपादक और लेखक यशवंत व्यास ने कहा कि आज पढ़ने की स्वतंत्र संस्कृति है। लोग वही पढ़ते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है।
उन्होंने लेखन को दो तरह का बताया: एक अपने लिए और दूसरा समाज के लिए। उन्होंने कहा कि 2010 के बाद दुनिया ‘इवेंट’ में बदल गई है, यहाँ तक कि मृत्यु भी एक इवेंट बन चुकी है।
एआई को लेकर फैली चिंता पर उन्होंने कहा कि यह हमारे समाज और सभ्यता पर विश्वास कम होने का परिणाम है। रचनात्मकता कभी खत्म नहीं होती और एआई कोई खतरा नहीं है।
युवा पीढ़ी के प्रति पूर्वाग्रह और नई सोच की आवश्यकता
पत्रकार त्रिभुवन ने कहा कि युवा पीढ़ी को लेकर हमारी धारणाएँ अक्सर पूर्वाग्रहग्रस्त होती हैं। इतिहास गवाह है कि हर नई चीज़ का विरोध पहले शिक्षकों और अभिभावकों ने ही किया है, रेडियो से लेकर बॉल पेन तक।
बाधाएँ बाहर नहीं, हमारे दृष्टिकोण में थीं। वरिष्ठ साहित्यकार सुबोध गोविल ने कहा कि हम नई पीढ़ी को वही पढ़ाना चाहते हैं जो हम पढ़ चुके हैं।
जबकि हमें उन्हें नया पढ़ने देने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। उन्होंने जेन-जी को एक खाली स्लेट बताया जिस पर नई कथाएँ, नए अनुभव, नए प्रश्न स्वयं आकार लेंगे।
उन्होंने कहा कि यह समय साहित्य के लिए बेहद संभावनाशील है। जहाँ शून्य दिखाई देगा, वहीं कोई नया युवा आकर उसे भर देगा।
लोकतंत्र और समकालीन पत्रकारिता पर संवाद
फेस्टिवल में लोकतंत्र और समकालीन पत्रकारिता पर भी एक महत्वपूर्ण सत्र हुआ। इसमें वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ, हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एन. के. पांडेय, दैनिक भास्कर के संपादक तरुण शर्मा, पत्रकार अंकिता शर्मा और गरिमा श्रीवास्तव के बीच सार्थक संवाद हुआ।
साहित्यिक यात्रा का मनमोहक समापन
दिन भर की चर्चाओं, विचारों, विमर्शों और कलात्मक संवेदनाओं की यात्रा का समापन एक मनमोहक मुशायरे के साथ हुआ। इसने श्रोताओं के दिलों में साहित्य की रोशनी देर तक जगाए रखी।