इन आंदोलनों के दबाव में कुछ पुलिस अधिकारियों को हटाया भी गया और जांच अधिकारी बदले गए। फिलहाल, युवा आईपीएस अधिकारी गोपीनाथ कांबले इस जांच को संभाल रहे हैं।
तीन संदिग्धों की पहचान, दो तैयार, एक अड़ा
जांच में तेजी लाते हुए एएसपी काम्बले ने तकनीकी साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर तीन संदिग्धों की पहचान की है। जांच को निर्णायक बनाने के लिए उन्होंने तीनों के नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराने की सहमति मांगी।
दो संदिग्धों ने सहमति दे दी लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि तभी टेस्ट कराएं जाएंगे जब तीसरा संदिग्ध भी तैयार हो। तीसरे संदिग्ध ने साफ इनकार करते हुए दो करोड़ रुपए की गारंटी मांगी। उसका कहना है कि वह नशा नहीं करता और अगर टेस्ट के दौरान उसे कोई शारीरिक हानि होती है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? यह मांग पुलिस के लिए न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि जांच में बड़ा रोड़ा बन गई है। न्यायालय ने भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए नार्को टेस्ट की अनुमति नहीं दी है।
न्याय की आस में विधवा भारती कंवर
गणपतसिंह की पत्नी भारती कंवर अब भी न्याय की आस लगाए बैठी हैं। उन्होंने 5 अगस्त को एसपी शैलेन्द्रसिंह इन्दोलिया को ज्ञापन देकर मांग की है कि इस प्रकरण में जल्द से जल्द कार्रवाई हो और आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए।
भारती कंवर का कहना है,
"मेरे पति की हत्या को एक वर्ष होने को आया है। पुलिस केवल आश्वासन दे रही है, कार्रवाई कुछ नहीं हो रही। अगर न्याय नहीं मिला तो मैं अपने दो छोटे बच्चों के साथ भूख हड़ताल पर बैठूंगी और तब तक नहीं उठूंगी जब तक हत्यारों को सजा नहीं मिलती।"
सर्व समाज का आक्रोश और दबाव
गणपतसिंह की हत्या के विरोध में केवल परिवार ही नहीं बल्कि पूरा राजपूत समाज और ग्रामीण समुदाय भी लगातार आक्रोश व्यक्त कर चुका है। राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने कई बार पुलिस प्रशासन को चेतावनी दी, लेकिन अब तक पुलिस कोई निर्णायक परिणाम नहीं दे पाई है।
मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने अक्टूबर 2024 में धरना स्थगित कराने के एवज में यह भरोसा दिलाया था कि लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों को हटाया जाएगा और जांच में तेजी लाई जाएगी। लेकिन इसके बावजूद परिणाम जस का तस है।
पुलिस की स्थिति और जांच की पेचीदगियां
जांच अधिकारी गोपीनाथ कांबले ने स्पष्ट किया कि तीनों संदिग्धों से सहमति लेने के प्रयास किए गए हैं। उन्होंने कहा:
"हमने तीन संदिग्धों के पॉलीग्राफ व नार्को टेस्ट करवाने की सहमति मांगी थी, लेकिन सहमति नहीं दी गई है। सबूतों को पुष्ट करने के लिए यह टेस्ट जरूरी हैं। अब अन्य आवश्यक प्रक्रिया भी अपनाई जाएगी।"
इस बयान से यह साफ है कि पुलिस को कानूनी प्रक्रिया में कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई संदिग्ध इस तरह की शर्तें रखकर जांच को बाधित कर सकता है?
कानूनी पहलू: क्या नार्को टेस्ट की शर्त वैध है?
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग केवल संबंधित व्यक्ति की सहमति से ही किया जा सकता है। किसी व्यक्ति को बलपूर्वक यह परीक्षण नहीं कराया जा सकता।
हालांकि, यदि व्यक्ति खुद सामने आकर अव्यावहारिक या असंवैधानिक शर्तें रखता है — जैसे 2 करोड़ रुपये की गारंटी — तो ऐसे मामलों में पुलिस अदालत से विशेष अनुमति लेकर वैकल्पिक तरीके अपना सकती है।
अब आगे क्या?
परिजन भूख हड़ताल की चेतावनी दे चुके हैं।
सर्व समाज फिर से प्रदर्शन की तैयारी कर रहा है।
जांच अधिकारी कानूनी प्रक्रिया को तेज़ करने की बात कह रहे हैं।
तीसरे संदिग्ध की अड़चन अब सबसे बड़ी बाधा है।
इंसाफ की राह अब भी कठिन
गणपतसिंह हत्याकांड राजस्थान के उन सैकड़ों मामलों में एक है जहां समय बीत जाता है, पर न्याय अधूरा रह जाता है। एक ओर पुलिस को सबूतों की कड़ी जोड़नी है, दूसरी ओर समाज को उम्मीद का साथ नहीं छोड़ना है। लेकिन जब कोई संदिग्ध खुलेआम दो करोड़ की शर्त रखे और पुलिस लाचार दिखे, तो यह न केवल न्याय प्रणाली की विफलता दर्शाता है, बल्कि पीड़ित परिवार की पीड़ा को और बढ़ा देता है।
अब देखना यह है कि क्या युवा आईपीएस गोपीनाथ कांबले इस उलझे हुए मामले को सुलझा पाएंगे और क्या भारती कंवर को न्याय मिलेगा — या फिर यह मामला भी राजस्थान की फाइलों में गुम हो जाएगा?