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अंता में सियासत का स्वाद: दाल-रोटी, डकैत और 'मैं हूँ बेचारा'

प्रदीप बीदावत प्रदीप बीदावत 57

सबसे पहले बात करते हैं निर्दलीय नरेश मीणा की। भई, इस बार उन्हें टिकट नहीं मिला, और उनकी नाराज़गी ऐसी फूटी है कि कांग्रेस की नींद हराम हो गई है। नरेश मीणा ने तो

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नमस्ते प्यारे पाठकों! दिवाली की धूम मची है चारों तरफ, पर राजस्थान के अंता विधानसभा क्षेत्र में तो लगता है सियासी पटाखे पहले ही फूटने लगे हैं। चुनाव का मौसम हो और कोई ज़ोरदार मसाला न मिले, ऐसा कैसे हो सकता है भला? इस बार अंता ने हमें वो मसाला दिया है, जिसे चखकर आप भी कहेंगे, 'वाह भई वाह, क्या खेल चल रहा है!'

अंता का अखाड़ा: दाल-रोटी और डकैत का तड़का!

चलिए, सबसे पहले बात करते हैं निर्दलीय नरेश मीणा की। भई, इस बार उन्हें टिकट नहीं मिला, और उनकी नाराज़गी ऐसी फूटी है कि कांग्रेस की नींद हराम हो गई है। नरेश मीणा ने तो सीधा आरोप जड़ दिया कि 'कुछ कांग्रेसी नेताओं के घर की दाल-रोटी प्रमोद जैन भाया के पैसों से चलती है!' सोचिए ज़रा, यह बयान कितना तीखा है! क्या वाकई हमारे नेताओं की सियासी भूख और घर की ज़रूरतें किसी एक के 'धन बल' से चलती हैं? नरेश मीणा ने तो प्रमोद जैन भाया को 'डकैत' तक कह डाला और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को भी नहीं बख्शा। उनकी मानें तो डोटासरा ने भाया को बचाने के लिए उनका टिकट काट दिया। है न कमाल की बात? अब आप ही बताइए, जब एक पार्टी के भीतर ही ऐसे आरोप लगें, तो बाहर की जनता क्या सोचेगी?

'मैं बेचारा' बनाम 'धन बल': अंता का अनोखा रण

एक तरफ नरेश मीणा का आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के उम्मीदवार मोरपाल सुमन ने 'मैं बेचारा उम्मीदवार हूं' का नया नारा बुलंद कर दिया है। मोरपाल जी नामांकन दाखिल करते ही खुद को 'बेचारा' बताकर जनता की सहानुभूति बटोरने में लगे हैं। उनका कहना है कि वे अंता की जनता के सुख-दुख के साथी हैं और बरसों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। सोचिए, एक तरफ करोड़ों के 'धन बल' के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ 'गरीब' और 'बेचारा' होने का दावा! सांसद दुष्यंत सिंह ने भी इस मुकाबले को 'राजा और रंक' की लड़ाई बताकर माहौल गरमा दिया है। वे कह रहे हैं कि मोरपाल सुमन को छत्तीस कौम का समर्थन मिलेगा। अब ये 'बेचारा कार्ड' कितना चलेगा, ये तो वक्त ही बताएगा, पर इतना तो तय है कि अंता का चुनाव अब सिर्फ मुद्दों पर नहीं, बल्कि 'दाल-रोटी', 'डकैत' और 'बेचारेपन' के दिलचस्प बयानों पर भी लड़ा जा रहा है।

सियासत का असली चेहरा या सिर्फ चुनावी जुमले?

अंता में वसुंधरा राजे की करीबी और भजनलाल सरकार के विकास कार्य भी एक मुद्दा हैं, पर क्या ये सारे आरोप-प्रत्यारोप और 'गरीबी' के दावों के शोर में दब नहीं जाएंगे? दिवाली की खुशियों के बीच अंता के उम्मीदवार घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं। कोई 'दाल-रोटी' का हिसाब मांग रहा है, कोई खुद को 'बेचारा' बता रहा है, और कोई 'डकैत' के आरोपों से जूझ रहा है। इस सब के बीच, असली सवाल यह है कि अंता का वोटर आखिर किस बात पर अपना फैसला सुनाएगा? क्या वह इन 'जुमलों' से प्रभावित होगा, या अपने भविष्य और क्षेत्र के विकास को देखकर ही 'दीयों' से रोशनी करेगा? यह तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे, पर फिलहाल तो अंता में सियासत का यह 'अजीबोगरीब' स्वाद जनता को सोचने पर मजबूर कर रहा है। क्या आप भी नहीं सोचते, कि कब हमारी राजनीति इन व्यक्तिगत आरोपों से ऊपर उठकर जनहित के मुद्दों पर केंद्रित होगी?

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