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नीलू की कलम से: जाओ ठाकुर! भूल जायेंगे..

नीलू शेखावत नीलू शेखावत

राजपूत की रेखाएं बड़े रूखेपन से खींची गई है। उसके एक हाथ में तलवार तो दूजे हाथ में कस्सी-कुल्हाड़ी रही। युद्धकाल में तलवार से जूझना तो शांतिकाल में खेत-खलिहान या चाकरी में खपना ही उसकी किस्मत में बदा था।

HIGHLIGHTS

  • राजपूत की रेखाएं बड़े रूखेपन से खींची गई है। उसके एक हाथ में तलवार तो दूजे हाथ में कस्सी-कुल्हाड़ी रही। युद्धकाल में तलवार से जूझना तो शांतिकाल में खेत-खलिहान या चाकरी में खपना ही उसकी किस्मत में बदा था।
neelu shekhawat jao thakur bhool jayenge

राजपूत की रेखाएं बड़े रूखेपन से खींची गई है। उसके एक हाथ में तलवार तो दूजे हाथ में कस्सी-कुल्हाड़ी रही। युद्धकाल में तलवार से जूझना तो शांतिकाल में खेत-खलिहान या चाकरी में खपना ही उसकी किस्मत में बदा था।

राज गया,घोड़े खड़े-खड़े हिनहिनाते रहे किन्तु बैलों पर ध्यान देना जरूरी हो गया। पुरखों ने कई पीढ़ियों से जिस जमीन की रखवाली की उसे संभालने के लिए भी उतनी ही जीवटता चाहिए थी जितनी युद्ध में।

समय के फेर को अंगीकार कर वह जमीन को खून की जगह पसीने से सींचने लगा किंतु स्वाभिमान के साथ। जमीन उसकी मां थी, उसका सर्वस्व किंतु राज तो वह जमीन ही छीन लेना चाहता था। नित्य प्रति अपमानजनक रवैए के चलते राजपूत असंतोष से भर उठा।

इधर लगान वृद्धि से किसानों की कमर तोड़ी जा ही रही थी।

तहसीलदार के गांव में पांव रखते ही गांव के गांव खाली होने लगते। लोग पेड़ों पर चढ़कर, जंगल में भागकर, यहां तक कि खड्डों-कुओं में कूदकर भी इस आपदा से बचने का प्रयास करते।

किसानों को ढूंढ ढूढकर बेंत मारे जाने लगे। बच्चे रोते,स्त्रियां करुण क्रंदन करती,जवान भागते और बूढ़े पिटते। रसूलपुर के बालक जोधा सिंह ने भी अपने पिता को ऐसे ही फिरंगियों के हाथों जलील होते देखा।

अगली बार तहसीलदार का लवाजमा लोगों ने गांव में घुसते हुए तो देखा किंतु निकलते हुए न देखा। खोजबीन में गए करिंदों को एक पत्र अलबत्ता मिल गया।
"लगान माफ करो और अपने लोग ले जाओ।" फिरंगी भय खाने लगे।

फतेहपुर में सहसा एक नाम चर्चित हुआ- जोधा सिंह अटैया।

लगान से गांव को राहत तो मिली मगर राजपूत किसान निशाने पर आ गए। 'ठाकुर', 'जमींदार','सामंत' आदि शब्दों में जहर भरने की शुरुआत स्यात यहीं से हुई जिसे आजाद भारत की राजनीति ने आगे बढ़ाया और जिसका दंश एक जाति 'परमाणु त्रासदी' की तरह अब तक भुगत रही है।

जोधा सिंह रुके नहीं। अब रक्षात्मक न होकर आक्रामक होने का समय था। देश भर में आहूत सत्तावन की क्रांति में जोधा सिंह भी हविष्य बने। जहानाबाद के सरकारी खजाने को लूटकर संगठन की शक्ति को मजबूत किया। जगह-जगह अंग्रेजी सरकार को टक्कर और चकमा देकर क्रांतिकारियों का मनोबल बढ़ाते रहे।

उन्हें रोकने के लिए कर्नल पावेल को अविलंब भेजा गया किंतु साथ गए लोग उनका शव लेकर लौटे। क्रोधित जोधा सिंह ने महमूदपुर,रानीपुर आदि कई अंग्रेजी थानों को लूटकर आग के हवाले करना शुरू किया। कई अंग्रेज दरोगा और सिपाही स्वाहा हुए। जोधा सिंह ने अंग्रेजों को खूब छकाया।

कैप्टन नील के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना डाल-डाल चलती तो जोधा सिंह पात-पात। तात्या टोपे से शस्त्र शिक्षा पाया हुआ यह वीर योद्धा अंग्रेज सेना के नाक का नासूर बन गया।

कहानी लंबी है और दुखांतक भी। सम्पूर्ण शक्ति झोंककर मुखबिरी के आधार पर उन्हें धोखे से घेरा गया। काल कोठरी की घटना को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने वाली धूर्त कौम ने जोधा सिंह समेत इक्यावन क्रांतिकारियों को गिन-गिनकर एक साथ फांसी दी।

पूरे गांव के सामने इमली के बड़े पेड़ पर बावन क्रांतिकारी लटकाए गए। लोगों में ऐसा खौफ पैदा किया गया कि लगभग दो महीने तक उन लटकती हुई नर देहों को चील, गिद्ध और कौए नोचते रहे किंतु खौफनाक मुनादी के चलते किसी में भी इतना साहस न था कि उन्हें फंदे से उतारे।

इतिहास में इससे अधिक नृशंस घटना कहीं न मिलेगी। करुणा भी करुणा विगलित हो जाए,क्रूरता भी इस क्रूरता से कांप जाए, ऐसा दृश्य। आखिर एक अंधेरी रात को जोधा सिंह के मित्र ठाकुर भवानीसिंह ने बचेकुचे लटकते नर कंकालों को उतरवाकर गंगा तट पर अंत्येष्टि करवाई।

ठाकुर अंग्रेजों के मन से पूरी तरह उतर चुके थे। कारण गोरखपुर क्षेत्र के एक कमिश्नर टिप्पणी समझाती है- "उच्च जाति के कुछ राजपूत कुनबों ने सर्वाधिक शत्रुता निभाई।"

सम्पूर्ण भारत में योजनाबद्ध तरीके से ठाकुरों को अंग्रेजी सेना से बेदखल किया गया और अन्य जातियों के सैनिक अधिकाधिक संख्या में भर्ती किए गए ताकि अंग्रेजी हुकूमत निरापद रह सके। हालांकि हुकूमत समझ चुकी थी -

"रंघड़ कदे नी छेड़नो जद कद करे बिगाड़"

खैर फतेहपुर जिले की बिन्दकी तहसील मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित जिस इमली के वृक्ष पर स्वातंत्र्य प्रेमियों को लटकाया गया वह बूढ़ा वृक्ष आज 'बावन इमली' के नाम से मूक आंसू बहा रहा है। सुना है यहां एक स्मारक भी है जो वन विभाग के अधीन है।

जोधा सिंह का नाम बस स्मारक पर अंकित होकर रह गया। उन्हें न पक्षपाती इतिहास ने जगह दी न चालबाज साहित्य ने। हिंदी के प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी इसी बिंदकी के बासिंदे थे पर जोधा सिंह से अनभिज्ञ। अन्यान्य नामों के बीच ठाकुर जोधा सिंह गुमनाम रह गए।

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...

जोधा सिंह और उनके साथियों को न माकूल चिता मिली और न ही चिताओं पर मेले।

जाओ ठाकुर! भूल जायेंगे, हम कृतघ्न भारतवासी...

- नीलू शेखावत

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