कोलकाता की डॉक्टर के साथ कैसा पाशविक कृत्य हुआ इस बारे में तो पिछले पाँच दिन से पूरा देश और दुनिया जान रहे हैं। इसलिए कैमरे की लाइट से दूर की बात करते हैं। मीडिया का अपना राग है जिससे उसका बाजार चलना है।
पर इन सबसे अलग उस डॉक्टर के मित्र या शुभचिंतक पहले दिन से ही दबी जुबान कॉल्स, व्लॉग, वीडियो या अन्य माध्यमों से कह रहे हैं कि जो कुछ दिखाया जा रहा है वह झूठ है। उनका इशारा अस्पताल के अंदरखाने की ओर है।
जो चैट और कॉल्स वाइरल हो रही हैं वे भी इशारा करती हैं कि शायद वहशी अंदर से ही हों। इतना ही नहीं, घटना का समय, आरोपी और अंजाम भी वह हो जो जनता को सुनाई गयी कहानी से एकदम अलग हो। उनकी बात पर कोई गौर क्यों नहीं कर रहा?
एक झूठ को दबाने के लिए दूसरा झूठ, दूसरे को दबाने के लिए तीसरा, चौथा और मामला बिगड़ता देखकर भीड़ का हल्लाबोल! सबकुछ तोड़ताड़ कर, पौंछ पान्छकर फाइल सीबीआई को सौंपना और पार्टी पार्टी खेलना! खून सारा पानी हो गया? ये उन्हें गुंडा कह रहे हैं और वे इन्हें। असली गुंडों की पो बारह। पांच दिन से डॉक्टर सड़कों पर हैं और मरीज मरण शैया पर।