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राजस्थान

ईको सेंसेटिव जोन में नियमों को ठेंगा दिखा रहे अधिकारी, आम आदमी बेहाल

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माउण्ट आबू में अधिकारियों की सरपरस्ती में पनप रहे भ्रष्टाचार और निर्माण नियमों के उल्लंघन का खुलासा। कैसे रईसों के लिए नियमों को ताक पर रखकर बहुमंजिला इमारतों की अनुमति दी जा रही है, जबकि आम आदमी एक बोरी सीमेंट के लिए तरस रहा है।

HIGHLIGHTS

  1. 1 माउण्ट आबू में ईको सेंसेटिव जोन के नियमों का रईसों के लिए सरेआम उल्लंघन। उपखण्ड अधिकारियों द्वारा बिना समिति की बैठक के एकल हस्ताक्षर से निर्माण सामग्री जारी करने के आरोप। अग्रवाल भवन मामले में मरम्मत की आड़ में तीन मंजिला नया निर्माण करने का खुलासा। आम आदमी को एक बोरी सीमेंट के लिए 27 किमी दूर आबूरोड जाने की मजबूरी।
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माउण्ट आबू  | न्यायिक आदेश के नाम पर आम आदमी को परेशान करके रईसों को मालामाल करने का उदाहरण प्रदेश में ही नहीं देश में कहीं देखना है तो माउण्ट आबू आ जाइए। फ्रेश पोस्टिंग पर लगे  नौकरशाहों की सरपरस्ती में पनपने वाला भ्रष्टाचार और अनियमितता यहां पर आपको दिखेगी। जांच करने जाएंगे तो ऐसे अधिकारियों की फेहरिस्त मिल जाएगी जो रईसो के लिए धडल्ले से न्यायालय की अवमानना कर कर रहे हैं और एलिजिबल होने पर भी आम आदमी पर न्यायालय के आदेश का डंडा चलाकर उनका जीना दुश्वार कर दिए हैं।

माउण्ट आबू में ईको सेंसेटिव जोन की आड में लगाई गई नियंत्रण और पाबंदियों को लागू करने का एकाधिकार मिलने पर उसका किस तरह से बेजा इस्तेमाल किया गया है ये माउण्ट आबू उपखण्ड अधिकारियों की कार्यप्रणाली देखकर लग सकता है। इस एकाधिकार को नियंत्रित करने के लिए सिरोही के पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने विधानसभा में सवाल उठाया था तो तत्कालीन स्वायत्त शासन मंत्री शांतिलाल धारीवाल ने सदन में भी कहा था कि एकाधिकार से निरंकुशता और  तानाशाही आ जाती है। इसके बाद उन्होंने माउंट आबू में निर्माण सामग्री देने में उपखंड अधिकारी का एकाधिकार समाप्त के लिए उपखंड अधिकारी, आयुक्त और पालिकाध्यक्ष की समिति बनाई थी। लेकिन, इस एकाधिकार को जारी रखने के लिए कुछ नेता टाइप लोगों ने राजस्थान उच्च न्यायालय में स्थगनादेश ले लिया। बदले में उन्हें उपखंड अधिकारी कार्यालय से निर्माण सामग्रियां जारी हुई।


एकाधिकार के दुरुपयोग़ का कांग्रेस शासन का उदाहरण लीम्बडी कोठी के रूप में दिया जाता था तो काग्रेस से साथ भाजपा शासन में इसका उदाहरण पटवार हल्के के पास बने अग्रवाल भवन के रूप में दिया जा सकता है। अग्रवाल भवन के निर्माण को लीम्बडी कोठी से दस कदम आगे का एकाधिकार का उल्लंघन, अवमानना और अनियमितता माना जा सकता है।वो इसलिए कि ये भवन उपखण्ड अधिकारी कार्यालय की ठीक अगली गली में और पटवार हल्के के सटा हुआ बना है। वही उपखंड अधिकारी जो मॉनिटरिंग कमेटी के नोडल अधिकारी बनाए गए थे।

माउण्ट आबू में निर्माण सामग्री लाने के लिए टोकन की व्यवस्था है। देश के अन्य स्थानों के विपरीत यहां पर नगर पालिका के संवैधानिक अधिकारों को छीनते हुए माॅनीटरिंग कमेटी ने उपखण्ड अधिकारी की अध्यक्षता में बनी सब कमेटी को निर्माण मरम्मत के लिए निर्माण सामग्री जारी करने के लिए अधिकृत किया था। लेकिन, उपखण्ड अधिकारियों ने अपने अधिकारों से परे जाकर बिना सब कमेटी की बैठक में प्रस्ताव लिए बिना एकल हस्ताक्षर से बेतहाशा निर्माण सामग्री जारी करना शुरू कर दिया। उपखंड अधिकारी की अध्यक्षता में बनी इस उप समिति में डीएफओ, पर्यटन अधिकारी, माॅनीटरिंग कमेटी के मनोनीत सदस्य आदि भी सदस्य थे। लेकिन, उपखण्ड अधिकारी के द्वारा बेतहाशा निर्माण समाग्रियां जारी करने के लिए सब कमेटी की बैठक की प्रोसिडिंग दोनों के ही पास नही है और न ही इनके विभाग में इस तरह की बैठकों के ऐजेंडे के लेटर हैं। मॉनिटरिंग कमेटी के द्वारा उपखंड अधिकारी को एकाधिकार देने का भी कोई दस्तावेज सामने नहीं आया है।

माउण्ट आबू ईको सेंसेटिव जोन है। सुप्रीम कोर्ट, एनजीटी और केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के आदेशानुसार इसका जोनल मास्टर प्लान जारी होने तक निर्माण, मरम्मत, नव निर्माण, पुननिर्माण के सभी अधिकारी माॅनीटरिंग कमेटी के पास सुरक्षित थे। 2015 को जोनल मास्टर प्लान लागू हुआ, लेकिन स्थानीय नागरिक ने इसे एनजीटी में चैलेंज कर दिया तो ये जोनल मास्टर प्लान रुक गया। एनजीटी और राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के बाद दिसम्बर 2024 में यहां का संशोधित जोनल मास्टर प्लान लागू हुआ। दिसम्बर 2024 तक निर्माण, मरम्मत, नए निर्माण के सारे अधिकार माॅनीटरिंग कमेटी के पास और माॅनीटरिंग कमेटी के माध्यम से उप समिति के पास थे।

माउण्ट आबू में उपखण्ड अधिकारी कार्यालय की ठीक अगली गली में अग्रवाल भवन था। पुरानी तस्वीरें और 2024 में नगर पालिका के द्वारा जारी किए गए नोटिस के अनुसार 2023 से पहले ये पुराना भवन दो मंजीला था। जिसकी दूसरी मंजिल पर पतरों की स्लेंटेड रूफ थी, इसकी तस्दीक 2022 की गुगल सेटेलाइट इमेज से भी हो जा रही है। ईको सेंसेटिव जोन के प्रावधानों के अनुसार माउण्ट आबू की माॅनीटरिंग कमेटी ने जुलाई 2023 की बैठक में पुराने और जर्जर भवनों को तोडकर उसी प्लींथ एरिया में बिना उंचाई बढाए हुए फिर से बनाने की अनुमति जिन 12 पत्रावलियों पर जारी की गई थी उनमें अग्रवाल भवन भी बताया जाता है। माउण्ट आबू में किसी भी तरह की निर्माण समाग्री बेचना निषेध किया हुआ है। इससे छोटी-मोटी मरम्मत के लिए एक बोरी सीमेंट, बजरी और ईंटे लेने के लिए भी 27 किलोमीटर दूर आबूरोड जाना पडता है। इससे निर्माण सामग्री के दाम से ज्यादा किराया लग जाता है। मानीटरिंग कमेटी की जुलाई 2023 की ही बैठक में माउण्ट आबू में साधारण और छोटी-मोटी मरम्मत के लिए निर्माण सामग्री उपलब्ध करवाने के लिए स्थानीय वेंडर को लाइसेंस देने का भी निर्णय लिया था। ये सब कांग्रेस के शासन मे हुआ था। इसका श्रेय कांग्रेस को मिलने की पूर्वाग्रह पाले विपक्ष के स्थानीय नेताओं ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन देकर माॅनीटरिंग कमेटी के निर्णय पर रोक लगाने की मांग की। इस निर्णय पर तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी कुंडली मारकर बैठ गए और अपने अधिकारों से परे जाकर जिला कलेक्टर को ओवरलुक करके हुए इनको अनुमतियां जारी नहीं की।

नगर पालिका के 19 सितम्बर 2024 के नोटिस के अनुसार  भवन को मरम्मत की अनुमति दी थी। सोमवार को अग्रवाल समाज समाज सेवा संस्थान के द्वारा दिए गए ज्ञापन के अनुसार इसके लिए उपखंड अधिकारी कार्यालय के द्वारा तीन साल पहले से ही निर्माण सामग्री जारी होने लगी थी। ये निर्माण सामग्री भी बिना सब कमेटी की बैठक के तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी  द्वारा एकल हस्ताक्षर से ही जारी की गई होगी। नगर पालिका के 2024 के नोटिस के अनुसार उपखण्ड कार्यालय की अगली गली में पुराने भवन को मरम्मत के नाम पर नया भवन निर्माण किया गया। छोटे से मकान के प्लास्टर के लिए स्क्वायर फीट नापकर सामग्री देने वाले उपखण्ड अधिकारियों द्वारा मरम्मत के नाम पर बिना सवाल पूछे अनापशनाप निर्माण सामग्रियां जारी की गई।

जब मरम्मत की अनुमति मिली थी इसके बाद चार उपखण्ड अधिकारी बदल गए, ये निर्माण धडल्ले से जारी रहा। नवम्बर 2024 मे माउण्ट आबू के नगर पालिका के बोर्ड का कार्यकाल समाप्त हो गया। उपखण्ड अधिकारियों को यहां का प्रशासक नियुक्त किया गया। अब माउण्ट आबू उपखण्ड अधिकारी के पास तीन चार्ज थे। नगर पालिका प्रशासक, माॅनीटरिंग कमेटी की सब कमेटी के अध्यक्ष और ईको सेंसेटिव जोन के प्रभारी अधिकारी का। 19 सितम्बर 2024 में नगर पालिका माउण्ट आबू के द्वारा इस संस्थान के अध्यक्ष को नोटिस दिया गया। इसमें लिखा है कि अग्रवाल भवन को मरम्मत की स्वीकृति जारी की गई थी। इसके अंतर्गत उनके द्वारा नियमों के विपरीत ग्राउंड प्लस टू भवन का नया निर्माण कर लिया गया। इसमें इसको अपने स्तर पर तोडने या नगर पालिका के द्वारा सीज किए जाने का ताकीद किया था।


ये नोटिस बता रहा है कि अग्रवाल भवन के नए निर्माण की अनमुति जारी नहीं हुई थी। सिर्फ मरम्मत की जानी थी। जुलाई 2023 की माॅनीटरिंग कमेटी की बैठक में भी इन्हें अनुमति मिली होती तो उसके तहत भी एग्जिस्टिंग प्लिंथ एरिया में बिल्डिंग के फ्लोर और उचाई बढाए बिना ये काम करना था। भौतिक निरीक्षण किया जाए तो पुराने भवन और नए भवन के दो मालों की उंचाई में अंतर भी निकल सकता है।


सेवा संस्थान के द्वारा सोमवार को उपखंड अधिकारी को दिए हुए ज्ञापन में दलील ये दी जा रही है कि नया बनाने और दो की जगह तीन तल्ला निर्माण करने के लिए विधिसम्मत अनुमति ली गई है। क्रोनोलाॅजी और नगर पालिका का सितम्बर 2024 का नोटिस बता रहा है कि दिसम्बर 2024 में जोनल मास्टर प्लान  जारी होने से पहले इस भवन के पुराने जर्जर भवन को तोडकर नया भवन बनाने की अनुमति जारी नहीं हुई थी तो ऐसे में पुराने दो तल्ला भवन की जगह तीन तल्ला भवन बन ही नहीं सकता था।


जुलाई 2023 की मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार इसे तोड़कर उसी प्लिंथ एरिया और ऊंचाई फ्लोर संख्या बढ़ाए बिना भवन का पुनर्निर्माण करने की अनुमति मिल भी जाती लेकिन, तत्कालीन शासन में रही कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी पार्टी के स्थानीय नेताओं ने कांग्रेस को राजनीतिक लाभ मिलने के पूर्वाग्रह के चक्कर में जिला कलेक्टर को ज्ञापन देकर जुलाई 2023 की माॅनीटरिंग कमेटी के निर्णयों को रोकने की मांग कर दी थी। 


जो निर्माण वर्तमान में मौके पर है नियमानुसार उस तरह का निर्माण की अनुमति आम आदमी की तरह इस भवन के लिए भी दिसम्बर 2024 को संशोधित जोनल मास्टर प्लान के लागू होने के बाद नगर पालिका के द्वारा दिया जा सकता था। लेकिन, नगर पालिका के द्वारा 19 सितम्बर 2024 को दिया हुआ नोटिस ही बता रहा है कि भवन के सिर्फ मरम्मत की अनुमति थी, लेकिन उसकी जगह नया निर्माण किया गया। माॅनीटरिंग कमेटी के पुनर्निर्माण के आदेश बिना और जोनल मास्टर प्लान के लागू होने से पहले ही इस भवन को नीचे से ही नया बना दिया गया था। जबकि इसके सिर्फ मरम्मत की अनुमति थी। मॉनिटरिंग कमेटी और नगर पालिका में बिना पुराने स्वीकृत ले आउट प्लान के किसी भवन को पुनर्निर्माण की स्वीकृति जारी नहीं की जा सकती थी इसलिए उस समय दर्ज पत्रावली में इसके नक्शे से भी ये तस्दीक हो सकती है। 

दिसम्बर 2024 को जोनल मास्टर प्लान लागू होने के बाद यहां पर 2019 का बिल्डिंग बायलाॅज लागू हो जाता है। उसके अनुसार ये भवन एस-टू जोन में आता है। यानि कि गैर योजनगत पुरानी घनी आबादी में। इसके अनुसार पुराना बाजार क्षेत्र में साढ़े बारह मीटर ऊंचाई का जी-3 का भवन बनाया जा सकता है। लेकिन, नोटिस बता रहा है कि दो मंजिलो का नया निर्माण संशोधित जोनल मास्टर प्लान लागू होने से पहले ही किया जा चुका था। यानि कि इस भवन को अनुमति संशोधित जोनल मास्टर प्लान के तहत नहीं मिली तो इसका तीसरा माला बन ही नहीं सकता है। इसके अलावा तीसरा माला भी तब ही बंन सकता है जब बिल्डिंग नौ मीटर चौड़ाई से ज्यादा चौड़ी सडक पर हो। 

संस्थान के द्वारा सोमवार को दिए ज्ञापन में किए गए दावे से ही कई बातों का खुलासा हो रहा है। इस ज्ञापन में बताया गया है कि भवन को बनाने के लिए 3.30 फीट जमीन छोड़कर सड़क को चौड़ा किया गया है। 3.30 फीट का मतलब है करीब एक मीटर। ऐसे में अग्रवाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष द्वारा दिया गया ज्ञापन भी दो संभावना की ओर इशारा कर रहा है। पहला ये कि ये सड़क 9 मीटर से कम चौड़ी थी और इस भवन को बायलॉज के अनुसार ग्राउंड प्लस थ्री बनाने के लिए सड़क की चौड़ाई नौ मीटर से ज्यादा करने के लिए ऐसा किया गया हो। दूसरा ये कि जमीन पर 3.30 फीट जगह छोड़ने का मतलब ये है कि भवन की नींव को ही पीछे खिसकाया गया हो। ऐसा तभी संभव है जब पुराने भवन को तोड़कर न्यू भवन का निर्माण किया गया हो, जैसा कि नगर पालिका के 19 सितम्बर 2024 के नोटिस में हवाला दिया गया है। यहा पर सडक की वर्तमान चौड़ाई में से इस 3.3 फीट को कम कर दिया जाय तो इस भवन  निर्माण से पूर्व की सड़क को वास्तविक चौड़ाई सामने आ जाएगी। 

अब उपलब्ध दस्तावेजों के कालक्रम के अनुसार पूरा मामला समझिए। नगर पालिका का सितम्बर 2024 का नोटिस बता रहा है कि इस भवन का तीसरा माला सितम्बर 2024 के बाद आए उपखण्ड अधिकारियों के कार्यकाल में बना है। नवम्बर 2024 में उपखण्ड अधिकारी नगर पालिका के प्रशासक बन चुके थे। दिसम्बर 2024 में संशोधित जोनल मास्टर प्लान लागू हुआ। दिसंबर 2024 बाद ही इस इलाके में नगर पालिका की अनुमति से साढे बारह मीटर उंचाई तक जी प्लस थ्री भवन का निर्माण हो सकता है वो भी तब जब सड़क की चौड़ाई 9 मीटर से ज्यादा हो। क्योंकि 1980 के माउंट आबू के बिल्डिंग बायलॉज में तो इस जगह पर सिर्फ ग्राउंड प्लस टू फ्लोर भवन बनाने की ही अनुमति थी। जोनल मास्टर प्लान लागू होने के बाद जारी होने वाली अनुमति पर प्रशासक के नाते उपखण्ड अधिकारी के हस्ताक्षर जरूरी हैं। ऐसे मे ये बात अविश्वसनीय है कि सितम्बर 2024 के बाद उपखण्ड अधिकारी कार्यालय की अगली गली में तीसरा माला बन गया तो इसकी निर्माण सामग्री भी उपखण्ड अधिकारी कार्यालय की जानकारी के बिना जारी हुई होगी। इसके बाद भी उपखण्ड अधिकारियों ने ये जानने का प्रयास नहीं किया कि इस भवन को दिसम्बर 2024 के संशोधित जोनल मास्टर प्लान के लागू होने के बाद अनुमति मिली है या नहीं। 


मुद्दा ये नहीं है कि ये भवन क्यों बन रहा है। मुद्दा ये है उपखण्ड अधिकारियों को ये अधिकार सुप्रीम कोर्ट, एनजीटी और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के नियम और कायदे सब पर बराबर रूप से लागू करने के लिए दिए गए है। तो फिर उपखण्ड अधिकारी जब चाहे तब आम आदमी के सम्मान से जीने और रहने के अधिकार को छीनकर आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत व्यक्ति या संस्थान को पोषित कर कैसे सकते हैं। आखिर कश्मीर में एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे का दावा करने वाली भाजपा की सत्ता में राजस्थान के कश्मीर में एक शहर में दो विधान कैसे चल सकता है।

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