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पालघर

नीलू शेखावत नीलू शेखावत 32
neelu shekhawat poem on palghar
पालघर

मैं कुछ ही क्षण देख पाई 
असहाय वृद्धों के मुख
निरूपाय कांपते गात
फिर कांप गए ये हाथ

प्राणों की भिक्षा मांगती आंखें
कैसी निरीहता कैसी कातरता
करुणा को भी करुणा हो आए
रुदन भी रोदन करने लग जाए

कितनी वीभत्सता कैसी क्रूरता
अब और कितनी होगी बर्बरता
जो ये साबित करेगी कि तुम
क्रूर हो,बर्बर हो,जाहिल हो

मैं क्षुब्ध हूं कहीं ज्यादा क्रुद्ध हूं
पर निश्शब्द हूं  कंठावरूद्ध हूं

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