अब बात करते हैं 'जेन ज़ी' की। पड़ोसी देशों की उथल-पुथल पर भागवत जी ने 'घातक विचारधारा' वाले 'नए पंथ' का ज़िक्र किया। चिंता ज़ाहिर की कि दुनिया भारत की ओर उम्मीद से देख रही है। लेकिन, ज़रा सोचिए, पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय की बात कितनी सही है कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर 'विफल' रही है, और बेरोज़गारी चरम पर है? क्या 'जेन ज़ी' का असंतोष सिर्फ़ 'घातक विचारधारा' है, या फिर उनका भविष्य अंधकारमय देखकर उपजा गुस्सा भी है? राधिका रामसेशन भी कहती हैं कि संघ को युवाओं के बढ़ते असंतोष का 'फ़ीडबैक' ज़रूर मिला होगा। तो, सरकार जी, 'अमृतकाल' में ये कैसा 'विषपान' हो रहा है?
धार्मिक सहिष्णुता और संघ-भाजपा का रिश्ता: क्या सब 'ठीक' है?
और लीजिए, संघ प्रमुख ने धार्मिक सहिष्णुता की बात भी कर डाली! बोले, "विदेशियों के धर्म को स्वीकार कर के रहने वाले हमारे अपने बंधु देश में हैं।" वाह! क्या कहने! लेकिन अगर ऐसा है तो अल्पसंख्यकों पर हमले क्यों होते हैं? बजरंग दल जैसी इकाइयाँ हिंसा क्यों करती हैं? क्या संघ ने कभी सोचा कि लोग धर्म क्यों बदलते हैं? कहीं इसमें जातिगत भेदभाव का हाथ तो नहीं?
अंत में, बात संघ और बीजेपी के रिश्तों की। इस बार भागवत जी का भाषण सरकार के लिए 'संदेश' या 'चेतावनी' जैसा नहीं लगा। राधिका जी कहती हैं, "मोदी जैसे प्रधानमंत्री आरएसएस को जल्दबाज़ी में नहीं मिलने वाले हैं।" मोदी जी संघ का एजेंडा पूरा कर रहे हैं, तो भला संघ क्यों नाराज़ होगा? लेकिन बात भी ग़ौर करने लायक है कि पिछले चुनावों में संघ कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता ने बीजेपी को बहुमत से दूर रखा। तो क्या यह 'नरमी' सिर्फ़ ऊपरी है? या संघ ने दिखा दिया कि 'ज़रूरत' किसे ज़्यादा है? भागवत जी ने इस पर ख़ामोशी ओढ़ ली, तो क्या ये 'शांत समंदर' के नीचे छिपी 'तूफ़ानी लहरों' का संकेत है?
तो दोस्तों, संघ प्रमुख का ये भाषण महज़ शब्दों का खेल था, या देश के लिए कोई गहरा चिंतन, कोई नई दिशा? क्या ये सिर्फ़ 'अपने लोगों' को संदेश था, या 'सबका साथ, सबका विकास' की कोई नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश? आप इन शब्दों को कैसे देखते हैं? क्या आपको लगता है कि संघ अपने सौ साल के सफ़र में सचमुच 'बदल' रहा है, या सिर्फ़ 'बदलने' का दिखावा कर रहा है? अपनी राय हमें ज़रूर बताइए। क्योंकि आख़िरकार, ये आपके और हमारे देश का सवाल है, है न?