संघ प्रमुख ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर भी बात की और अमेरिका द्वारा अपनाई गई नई टैरिफ़ नीति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस नीति की मार सभी पर पड़ रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दुनिया में आपसी संबंध बनाना कितना आवश्यक है क्योंकि कोई भी देश अकेले नहीं जी सकता। हालांकि, भागवत ने चेतावनी दी कि यह निर्भरता मजबूरी में नहीं बदलनी चाहिए। उन्होंने भारत को आत्मनिर्भर बनने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा, "हमें स्वदेशी पर भरोसा करने और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।" उनका मानना था कि अमेरिकी टैरिफ़ नीति उनके अपने हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, लेकिन इसका प्रभाव वैश्विक है, और ऐसे में भारत को अपनी आर्थिक संप्रभुता बनाए रखनी होगी।
पड़ोसी देशों की स्थिति और हिंसक प्रदर्शनों की आलोचना
मोहन भागवत ने नेपाल और बांग्लादेश सहित भारत के कुछ पड़ोसी देशों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जब सरकार जनता से दूर हो जाती है तो लोगों में असंतोष पैदा होता है। हालांकि, उन्होंने हिंसक प्रदर्शनों के तरीके की कड़ी आलोचना की। भागवत ने कहा, "अगर हम अब तक की राजनीतिक क्रांतियों का इतिहास देखें तो उनमें से किसी ने भी अपना उद्देश्य कभी हासिल नहीं किया। हिंसक प्रदर्शनों से कोई उद्देश्य हासिल नहीं होता, बल्कि देश के बाहर बैठी शक्तियों को अपना खेल खेलने का मंच मिल जाता है।" उन्होंने जोर दिया कि लोकतांत्रिक तरीके से बदलाव आता है और हिंसक परिवर्तनों से अराजकता की स्थिति बनती है, जो किसी भी देश के लिए हितकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पड़ोसी देशों में ऐसी उथल-पुथल भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि वे पहले हमारे लोग ही थे।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का संबोधन
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी सभा को संबोधित किया। उन्होंने महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। कोविंद ने आरएसएस की शताब्दी का ज़िक्र करते हुए कहा कि नागपुर की पावन भूमि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसी महान विभूतियों की स्मृतियों से जुड़ी है। उन्होंने संघ में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, "संघ में किसी प्रकार का कोई जाति भेदभाव नहीं है। इस तरह का मेरा पहला एक्सपीरियंस भी संघ में ही था। जहां पूरा सम्मान और कोई भेदभाव नहीं मिला।" यह टिप्पणी संघ की समावेशी प्रकृति को रेखांकित करती है।
सरसंघचालक मोहन भागवत के संबोधन ने भारत को वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति मज़बूत करने, आंतरिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीकों पर बल दिया, जबकि हिंसक आंदोलनों से उत्पन्न होने वाली अराजकता के प्रति आगाह किया।