इसके बाद अगले दिन शीतलाष्टमी पर शीतला माता को ठंडे पकवानों का भोग लगाया जाता है।
इस भोजन में दही, राबड़ी, मालपुआ, पकौडी, पापड़ी, हलवा, आदि शामिल होते हैं। शीतला माता को बच्चों की संरक्षिका माना जाता है।
शीतला माता की पूजा से परिवार खासतौर से बच्चे निरोगी रहते हैं। माता के आशीर्वाद से बच्चों को बुखार, खसरा, चेचक, आंखों के रोग से छुटकारा मिलता है।
राजधानी जयपुर में स्थित चाकसू कस्बे में शीतलाष्टामी पर बड़े मेले का आयोजन होता है।
शीतलाष्टामी के मौके पर चाकसू में शील डूंगरी पर हर साल वार्षिक मेला भरता है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामना और शीतला माता के दर्शनों के लिए आते हैं।
माता शीतला का ये मंदिर करीब 500 साल पुरान है। शीतलाष्टामी पर यहां जयपुर राजदरबार की ओर से आज भी पहला भोग माता को प्रसाद के रूप में लगाया जाता है।
शील की डूंगरी पर विराजमान माता शीतला के दर्शन के लिए राजस्थान ही नहीं अपितु देश के कई राज्यों से भी श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं।

शीतलाष्टमी के मौके पर यहां 2 दिवसीय लक्खी मेले का आयोजन होता है। जिसमें राजस्थान संस्कृति की अलग ही छाप देखने को मिलती है।
इस मेले में राजस्थानी सांस्कृतिक के साथ ही लोगों में सामाजिक समरसता भी दिखाई देती है।
कहा जाता है कि, माता के इस मंदिर का निर्माण जयपुर के भूतपर्व महाराजा माधोसिंह ने करवाया था।
मंदिर में बारहदरी पर लगे शिलालेखों के अनुसार, जयपुर महाराजा माधोसिंह के पुत्र गंगासिंह एवं गोपाल सिंह के जब चेचक हो गई थी।
तब शीतला माता की कृपा से वह ठीक हुए थे। इसके बाद राजा माधोसिंह ने शील की डूंगरी पर मंदिर एवं बारहदरी का निर्माण कराया था।
जयपुर राजदरबार की ओर से बनाए गए इस मंदिर के प्रति क्षेत्र के लोगों की काफी आस्था है।
श्रद्धालु अपने घरों में बना बासी भोजन यहां लाकर माता को अर्पित करते हैं और उसके बाद खुद भी ठंडा भोजन ही ग्रहण करते हैं।
शील की डूंगरी पर भरने वाले इस वार्शिक मेले में आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शनों के साथ-साथ मेले के अवसर पर समाजों के आपसी झगड़े भी मिटाते हैं और लड़के-लड़कियों के शादी विवाह के रिश्ते भी तय करने पहुंचते हैं।