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भारत

जब पंडित नेहरू ने आजादी से पहले ग्रहण किया सेंगोल राजदंड तो क्यों नाराज हो गए डॉ भीमराव अंबेडकर

लोकेन्द्र किलाणौत लोकेन्द्र किलाणौत 27

देश के नए संसद भवन के शिलान्यास के साथ ही जिस बात को लेकर पूरे देश में जिज्ञासा बनी हुई है वह है नई संसद भवन में रखा जाना वाला सेंगोल जिसे प्रधानमंत्री के द्वारा नए संसद भवन में स्थापित किया जाएगा.

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देश के नए संसद भवन के शिलान्यास के साथ ही जिस बात को लेकर पूरे देश में जिज्ञासा बनी हुई है वह है नई संसद भवन में रखा जाना वाला सेंगोल जिसे प्रधानमंत्री के द्वारा नए संसद भवन में स्थापित किया जाएगा. सेंगोल को लेकर छिड़ी बहन के बीच अब लगातार नए रोचक तथ्य सामने आ रहे है.

खुद गृहमंत्री अमित शाह ने सेंगोल से जुडी जानकरियों से पर्दा उठाते हुए बताया है कि ये सेंगोल जिसे राजदंड कहा जाता है, तमिलनाडु के पुजारियों ने 15 अगस्त 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरू को दिया था और ये सेंगोल दरअसल सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है.

चर्चा सी राजगोपालाचारी पर भी है कि उन्होंने ही पंडित नेहरू और माउंटबेटन को इस सेंगोल के बारे में बताया था.राजगोपालाचारी से जब सेंगोल के बारे में पता चला तो पंडित नेहरू ने तिरंगा फहराने से पहले उस सेंगोल को स्वीकार किया. 


लेकिन डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर का भी इस सेंगोल को लेकर अपना एक मत है जिस पर देश में कही भी चर्चा नहीं की जा रही है. डॉ अंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय में इसी सेंगोल के बारे में थोड़ा सा जिक्र मिलता है.

डॉ अम्बेकर ने उत्तर - बनाम दक्षिण नाम के चैप्टर में लिखा है कि - उत्तर और दक्षिण में भारी अंतर है. उत्तर रूढ़िवादी है तो दक्षिण प्रगतिशील. उत्तर में अंधविश्वासी है तो दक्षिण में बुद्धिजीवी. दक्षिण शिक्षा की दृष्टि से आगे है तो उत्तर पिछड़ा हुआ. दक्षिण की संस्कृति आधुनिक है तो उत्तर की प्राचीन. 

डॉ अंबेडकर आगे लिखते है कि -

क्या प्रधानमंत्री नेहरू 15 अगस्त 1947 को उस यज्ञ में नहीं बैठे जो बनारस के ब्राह्मणो ने एक ब्राह्मण के स्वतंत्र और स्वाधीन भारत के प्रधानमंत्री बनने के उपलक्ष में किया था. क्या उन्होंने वह राजदंड ग्रहण नहीं किया था जो उन ब्राह्मणो ने उन्हें दिया और वह गंगाजल नहीं पिया था जो वह लेकर आए थे ? 

यहाँ डॉ अंबेडकर उसी राजदंड की बात कर रहे है जिसे लेकर अब पूरे देश में जिज्ञासा बनी हुई है. डॉ अंबेडकर इस बात का खुलासा भी करते है कि 15 अगस्त 1947 को ना केवल पंडित नेहरू ने वह राजदंड स्वीकार किया था. 

बल्कि इसके लिए बनारस के ब्राह्मणो द्वारा एक बड़ा यज्ञ भी किया गया था जिसमे नेहरू खुद बैठे थे और प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्होंने गंगाजल भी पिया था.

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