अजमेर | राजस्थान की न्यायपालिका ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अपराध कितना भी जघन्य क्यों न हो, कानून के हाथ अपराधी तक पहुंच ही जाते हैं। अजमेर की महिला उत्पीड़न मामलों की विशेष अदालत ने एक साल पुराने चित्तौड़गढ़ एसिड अटैक मामले में अपना फैसला सुनाते हुए आरोपी मोहम्मद इस्माइल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह फैसला केवल एक सजा नहीं है, बल्कि उन तमाम पीड़ितों के लिए उम्मीद की एक किरण है जो न्याय की आस में अदालतों के चक्कर काटते हैं। घटना की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक 12 साल की मासूम बच्ची को अपनी एक आंख की रोशनी हमेशा के लिए गंवानी पड़ी और उसका पूरा चेहरा झुलस गया। न्यायाधीश उत्तमा माथुर ने इस मामले की सुनवाई के दौरान बेहद संवेदनशील और सख्त टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि तेजाब का हमला शरीर के किसी अंग को जला देने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उस इंसान के भविष्य, उसके द्वारा देखे गए सपनों और उसके पूरे परिवार की मानसिक शांति को भी स्वाहा कर देता है। यह एक ऐसा घाव है जो समय के साथ भरता नहीं, बल्कि ताउम्र पीड़ित को अंदर ही अंदर मारता रहता है।
मां-बेटी पर तेजाब फेंकने वाले को उम्रकैद: अजमेर कोर्ट का बड़ा फैसला: मां-बेटी पर तेजाब फेंकने वाले मोहम्मद इस्माइल को उम्रकैद, जज बोलीं- 'एसिड सपनों को भी जला देता है'
चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन पर एक साल पहले मां-बेटी पर तेजाब से हमला करने वाले दोषी मोहम्मद इस्माइल को अजमेर की महिला उत्पीड़न कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस हमले में 12 साल की मासूम ने अपनी एक आंख की रोशनी खो दी।
HIGHLIGHTS
- अजमेर की महिला उत्पीड़न कोर्ट ने दोषी मोहम्मद इस्माइल को उम्रकैद की सजा सुनाई।चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन पर मां-बेटी पर तेजाब फेंकने का है पूरा मामला।एसिड अटैक के कारण 12 साल की मासूम बच्ची ने अपनी एक आंख की रोशनी गंवा दी।कोर्ट ने दोषी पर 2 लाख का जुर्माना लगाया और पीड़ितों को सहायता देने की अनुशंसा की।
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खौफनाक वारदात की पूरी कहानी
सरकारी वकील नरेश कुमार धूत ने अदालत में दलील दी कि दोषी ने जिस क्रूरता के साथ इस वारदात को अंजाम दिया, वह किसी भी तरह से माफी के योग्य नहीं है। अभियोजन पक्ष ने घटना का पूरा ब्यौरा देते हुए बताया कि मध्य प्रदेश का यह परिवार एक धार्मिक यात्रा के सिलसिले में राजस्थान आया था। 26 अप्रैल 2025 की वह सुबह उस परिवार के लिए किसी डरावने सपने जैसी थी। 25 अप्रैल को वे अजमेर से चित्तौड़गढ़ पहुंचे थे और रात को प्लेटफार्म नंबर 4 पर रुके थे। सुबह करीब 5 बजे, जब मां और बेटी रेलवे ट्रैक के पास झाड़ियों की ओर गए थे, तब आरोपी मोहम्मद इस्माइल वहां पहुंचा। आरोपी को अपनी ओर आता देख बच्ची ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन दरिंदे ने बिना कुछ सोचे-समझे अपनी बोतल में भरा घातक तेजाब मासूम के चेहरे पर फेंक दिया। जब मां अपनी बेटी को बचाने के लिए आगे बढ़ी, तो आरोपी ने उन पर भी तेजाब उड़ेल दिया और बस स्टैंड की तरफ भाग गया।
जांच और वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका
इस क्रूरता के कारण बच्ची की एक आंख की रोशनी पूरी तरह खत्म हो गई और दूसरी आंख से भी उसे अब बहुत कम दिखाई देता है। पुलिस जांच में सीसीटीवी फुटेज सबसे बड़ा हथियार बनी, जिसके आधार पर आरोपी को इंदौर से गिरफ्तार किया गया। एएसआई धूल तीरगर और कॉन्स्टेबल पवन कुमार ने डिजिटल साक्ष्यों को जुटाने में अहम भूमिका निभाई। कोर्ट ने इस मामले में वैज्ञानिक साक्ष्यों को भी काफी महत्व दिया। धारा 63(4) भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत डिजिटल सर्टिफिकेट के साथ पेन ड्राइव पेश की गई। एफएसएल रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया कि घटनास्थल पर मिला रसायन हाइड्रोक्लोरिक एसिड था, जिसने बच्ची के कपड़ों और शरीर को बुरी तरह जला दिया था। अभियोजन पक्ष ने कुल 17 गवाह और 57 दस्तावेज पेश किए, जिससे आरोपी का दोष पूरी तरह सिद्ध हो गया।
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला
जज ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'लक्ष्मी बनाम भारत संघ' (2014) मामले का जिक्र करते हुए कहा कि यदि ऐसे अपराधियों को उनके किए की कड़ी सजा नहीं दी गई, तो समाज में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा करना असंभव हो जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी आधार पर सजा में कोई भी रियायत अपराधियों के हौसले बढ़ाएगी। कोर्ट ने आरोपी मोहम्मद इस्माइल पर 2 लाख रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया है। इसके साथ ही, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण चित्तौड़गढ़ को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि पीड़ित मां और बेटी को एक-एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता तत्काल प्रदान की जाए। यह मामला समाज की उस विकृत मानसिकता पर प्रहार करता है जहां लोग अपनी कुंठा निकालने के लिए किसी मासूम की जिंदगी तबाह करने से भी पीछे नहीं हटते। आज के दौर में जब हम महिला सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, तब अजमेर कोर्ट का यह फैसला एक नजीर पेश करता है। यह न्याय की जीत है और उन अपराधियों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो मासूमों के सपनों को जलाने की जुर्रत करते हैं। पीड़ितों के जख्म शायद कभी न भरें, लेकिन इस फैसले ने समाज को यह भरोसा दिलाया है कि न्याय अभी जिंदा है।
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