दो दिन राजस्थान में
दो साल ऐसे थोड़े बिताये हैं हमने राजस्थान में। 2006 से 2008 तक। ढेर सारी यादें हैं। ढेर सारे बहाने हैं। 17 मार्च तक राजस...
यह मिथिलेश कुमार सिंह है। कहते हैं स्याही शब्दों को जिंदा नहीं करती, लेकिन मिथिलेशजी के जज्बात कागजों के कलेजे कंपा देते हैं। दैनिक भास्कर, सहारा समय, आईनेक्स्ट जागरण और इंडीपेंडेंट मेल जैसे कई न्यूज प्रकाशनों में सैकड़ों पत्रकारों को उंगली पकड़कर आगे लाने वाले मिथिलेश वाकई शब्दों केमिथिलेश हैं। इनके शब्द विदेह होने के बावजूद अपनी देह का अहसास कराते हैं और बाहों में भर लेते हैं। हमें सहलाते हैं, पुचकारते, बहलाते और कभी—कभी डांट भी देते हैं। इनके शब्द कभी पैरों से लिपट जाते हैं। आंखों को बहने पर मजबूर करते हैं, खिलखिलाने को भी। पलकों के झुक जाने को, होठों के मुस्कुराने को और कुछ भी न बोल पाने को भी ये शब्द हमें मजबूर कर देते हैं.
दो साल ऐसे थोड़े बिताये हैं हमने राजस्थान में। 2006 से 2008 तक। ढेर सारी यादें हैं। ढेर सारे बहाने हैं। 17 मार्च तक राजस...
हम जब आपरेशन पर उतरेंगे तो नौटंकी के तुम्हारे सारे ठाठ धरे रह जाएंगे, तुम्हारे तमाम परदों के चीथडे़ उड़ जाएंगे और जगह नह...
दो- ढाई कमरों वाली उस जगह में सोफे होंगे, कालीन बिछी होगी, दीवार पर कुछ मेडल होंगे, कंहरती हुई कोई दीवाल घड़ी होगी, कोई...
उर्दू में गिरहबंदी की परंपरा बहुत समृद्ध रही है। जानते हैं, जिस मिसरे के पेशेनज़र यह ग़ज़ल कही गयी, वह मिसरा मूल रूप से...
पूरा परिचय यह हो सकता है कि वह मूल रूप से कहां का है, उसका घर कहां है, इस ग्लोब के किस हिस्से का है, किस खीत्ते का है, उ...
वहां अब दाढ़ी बनायी जा रही है, बाल काटे जा रहे हैं। रहा होगा कभी सत्कार होटल। मत रो रुनझुन! हम तुम्हारी भूख का मान रखेंग...
वह बारूद का स्वाद भी जानता है और जोहरा बाई की ठुमरी की नजाकत भी समझता है। फिसलन और चुभन जहां एक साथ मिलें और फिर जो तस्व...
जाने को तो हम शैलेश की गाड़ी से भी निकल सकते थे और डाक्टर रवि की गाड़ी से भी। लेकिन इतनी सारी खबरें, खबरों के भीतर की खब...
आंखें देख नहीं पा रहीं, आवाज़ देने पर भी दिमाग का क्रोनोमीटर उसे बता नहीं पा रहा कि यह मिथिलेश है जिसके साथ उसने दर्जनों...
मैंने वादा किया था, मैं लिखूंगा। लगातार लिखूंगा। लिखना बचाता है, इसलिए। संजीदगी से लिखा क्या? वह कौन सा लिखा- पढ़ा है मे...
यह कवि है रवींद्र भारती। बहुत दूर रहते हुए भी जो हमारे बेहद करीब होने की प्रतीति दिलाता है- किसी खेत, किसी खलिहान, किसी...
शेड्स बहुरंगी हैं, लिहाजा विषयांतर भी संभव है क्योंकि कंठ स्वरों में फूटे किस्से एक दिन में खतम नहीं होते। यह वह इतिहास...
पहले पटना सिर्फ पटना हुआ करता था और मुद्दतों सिर्फ पटना ही रहा। दानापुर,फुलवारी, मनेर, सिटी, कुम्हरार, फतुहा, बिहटा, कुल...
उस बुलडोजर की अपनी कोई आवाज़ नहीं होती। कोई भोंपू, कोई मुनादी, कोई डुगडुगी पार्टी नहीं हुआ करती है उसके साथ। तो.. ऐसा ही...