हंसोगे भी! पूछोगे भी!!
हम एक चिट्ठी लिखना चाहते हैं। हम लिखना चाहते हैं कि धरती के लोगों से हमारा जी भर गया। यह भी कि वह धरती जहां हम पैदा हु...
यह मिथिलेश कुमार सिंह है। कहते हैं स्याही शब्दों को जिंदा नहीं करती, लेकिन मिथिलेशजी के जज्बात कागजों के कलेजे कंपा देते हैं। दैनिक भास्कर, सहारा समय, आईनेक्स्ट जागरण और इंडीपेंडेंट मेल जैसे कई न्यूज प्रकाशनों में सैकड़ों पत्रकारों को उंगली पकड़कर आगे लाने वाले मिथिलेश वाकई शब्दों केमिथिलेश हैं। इनके शब्द विदेह होने के बावजूद अपनी देह का अहसास कराते हैं और बाहों में भर लेते हैं। हमें सहलाते हैं, पुचकारते, बहलाते और कभी—कभी डांट भी देते हैं। इनके शब्द कभी पैरों से लिपट जाते हैं। आंखों को बहने पर मजबूर करते हैं, खिलखिलाने को भी। पलकों के झुक जाने को, होठों के मुस्कुराने को और कुछ भी न बोल पाने को भी ये शब्द हमें मजबूर कर देते हैं.
हम एक चिट्ठी लिखना चाहते हैं। हम लिखना चाहते हैं कि धरती के लोगों से हमारा जी भर गया। यह भी कि वह धरती जहां हम पैदा हु...
गुरु का काम ऊर्जावान बनाना होता है लेकिन आग जैसा कुछ अगर हमारे भीतर नहीं है तो वह क्या कर लेगा? कहां से ऊर्जा लायेगा वह...
इसका नाम कचौड़ी गली क्यों पड़ गया? किसने इसे यह नाम दिया और दिया तो फिर पुराना नाम गायब क्यों हो गया? सरकारी दस्तावेज तक...
बूढ़ों के पास निपढ़ औरतों के इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता। वे झींकते हैं। वे खीझते हैं। वे अपनी चुप्पी पर सिर खुजाते है...
एक लड़की गा रही है। हीरोइन रही होगी। वह गा रही है- पंख होती तो उड़ आती रे... रसिया ओ बालमा, तुझे दिल के दाग दिखलाती रे.....
ग़ालिब और कबीर के बीच लगभग चार सदी का जो फासला है, क्या इन चार सौ वर्षों में यह दुनिया नहीं बदली? सोचिएगा आप भी। हम भी स...