यह जीवन से विराग का पहला पाठ था। कमोवेश ऐसा ही विराग तो कसाइयों या जल्लादों में होता है जब वे किसी को हलाल करते हैं या सूली चढ़ाते हैं।
कच्ची नींद का पक्का आसरा
तो साधो! हम बहुत दिनों तक विरागी रहे और उस दौर में जितने भी गुरु आये, किसी ने हमारा भला नहीं किया। भला कर सकने की सूरत भी नहीं थी क्योंकि मोह माया के तमाम बंधन हमारे लिए तब तक पीट पाट कर बरोबर किये जा चुके थे।
अलबत्ता भला हो उन लड़कियों का जो स्कूल मे़ं अंधाधुंध लाठीचार्ज की ज़द में घिरे हम जैसे सुकुमारों को देख कर लोर चुआतीं। कभी अकेले में तो कभी दो, तीन या चार की संख्या में। गुरु जी महराज की नजरें बचाते हुए।
यही वह दौर था जब हमने जाना कि तुम तन्हा नहीं हो बाबू फिसड्डी लाल। सदियों से पिटते रहने वाले। सदियों तक पिटने वाले। तुम्हारे साथ रोने वाले भी हैं, तुम्हारी पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह महसूस करने वाले भी।
ये लड़कियां हैं जिन्हें तुम्हारी पीड़ा सालती है। यह पीड़ा करेजा चीर जाती है उनका जब तुम गदहा की तरह धुलते हो। काहे? स्कूल न जाने के लिए, और काहे। तो साधो! हमारी पहली गुरु वे लड़कियां ही हैं जिन्होंने जीवन के राग रंग से हमारा राब्ता कराया। कच्ची नींद के पक्के आसरे जैसा राब्ता।
तुम भी रोये हो, हम भी रोये है़ं..
अमूमन हम झूठ नहीं बोलते। हम क्या, हमारे जैसा कोई भी अमूमन झूठ नहीं बोलता होगा। लेकिन इसका मतलब यह हरगिज मत लगाइए कि खाना- पखाना, हर वक्त हम सच की ही सवारी करते हैं या सच को ही ओढ़ते- बिछाते हैं।
इसकी एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि सारा खेल सत्य का उतना नहीं है जितना शिवम् और सुंदरम का है। ये दोनों जहां रहेंगे, अपने आप दमकने लगेगा आपके भीतर महीनों से, बरसों से बेजान पड़ा आबनूसी सत्य।
सच हमेशा बेरंग और अनगढ़ होता है। उसे रंदा तो मिलना ही चाहिए न और यह काम कोई अदना आदमी तो करने से रहा। यही काम गुरु करता है। वह आपको सब कुछ सिखाता है। अच्छा भी। भला भी। रुचिकर भी। गरिष्ठ भी। सुपाच्य, अपाच्य, कुपाच्य भी। वह सब कुछ जिसका इस दुनिया मे़ं मायने मतलब है और जहां से राहें खुलती हैं समझदारी और बेदारी की। वह वैसा ही था।
सीधे सीधे हमारा गुरु होने की मान्यता प्राप्त शर्तें तो वह पूरी नहीं करता था लेकिन उसने जो सिखाया, वह क्या खा कर कोई उस्ताद सिखाएगा। ज़ाहिर है, वह गुरुवत ही था। गुरुवत से भी बड़ी कोई टैगलाइन बनती हो तो जोड़ लीजिए आप उसके नाम के साथ। उम्र भले ही हमारे बराबर रही हो। भले ही हम साथ साथ खेले, पले- बढ़े, आवारागर्द हुए और बाद में दुनियादार और शरीफ भी।
इतनी सारी विकास यात्राएं हमने कभी साथ साथ तो कभी तन्हा पूरी कीं। वह अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन लगता नहीं कि वह चला गया। कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से। उसे गुजरे पांचेक साल बीत गये।
मिडिल स्कूल तक हम साथ साथ रहे। बोर्ड इम्तहान में वह फेल हो गया और रोते कलपते हमने बाजी मार ली। रिजल्ट आया तो वह बहुत रोया।
हमारे गले लग कर: मीता रे! अब तू पटना जइबे? ऊहें पढ़बे? ( अब तुम पटना जाओगे? अब तुम वहीं पढ़ोगे?)। हम दोनों भीग गये। रोते- रोते। जाना तो पड़ेगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अखबार में छपी वह खबर ही झूठी हो जिसमें हम पास कर गये और हमारा उस्ताद फेल?
उन दिनों अखबार भरोसे का नाम हुआ करते थे। आज जैसे नहीं कि आज खबर छापो और कल उतने ही निस्पृह भाव से उसका खंडन भी। खबर झूठी नहीं हो सकती। जरूर फेल कर गया है हमारा मीता। अब वह क्या करेगा? अब वह गोबर उठाएगा। मवेशी चराएगा।
कथा कहने और पोथी- पतरा बांचने के अपने खानदानी नुस्खे पर काम करेगा। नक्षत्रों की गणना करेगा और शादी- विवाह, मरनी- जीनी के कर्मकांड करायेगा। लेकिन वह श्लोक कैसे पढ़ेगा? पढ़ेगा। वह भी पढ़ेगा। वह संस्कृत पढ़ेगा। काम लायक सीख लेगा। पड़ोस के गांव की संस्कृत पाठशाला से। फिर तो वह अच्छे अच्छों की बैंड बजाएगा।
उसके निशाने पर कौन था, उसका ड्रीम प्रोजेक्ट क्या था- यह सारा कुछ बाद की किश्त में। फिलहाल इतने से ही काम चलायें। यह खतम होती पीढ़ी के जांनिसारों का अफसाना है। देर तो लगेगी इसे लिखने में और आपको समझने में।