युग की समयावधि क्या होती है
फिल्मी दुनिया से जुड़े पुरुष गायकों में यह सर्फ जिन चुनिंदा लोगों को हासिल है, उनमें पंकज उधास भी आते हैं- ऐसा हमारी जानकारी में कम से कम नहीं है। केए...
यह मिथिलेश कुमार सिंह है। कहते हैं स्याही शब्दों को जिंदा नहीं करती, लेकिन मिथिलेशजी के जज्बात कागजों के कलेजे कंपा देते हैं। दैनिक भास्कर, सहारा समय, आईनेक्स्ट जागरण और इंडीपेंडेंट मेल जैसे कई न्यूज प्रकाशनों में सैकड़ों पत्रकारों को उंगली पकड़कर आगे लाने वाले मिथिलेश वाकई शब्दों केमिथिलेश हैं। इनके शब्द विदेह होने के बावजूद अपनी देह का अहसास कराते हैं और बाहों में भर लेते हैं। हमें सहलाते हैं, पुचकारते, बहलाते और कभी—कभी डांट भी देते हैं। इनके शब्द कभी पैरों से लिपट जाते हैं। आंखों को बहने पर मजबूर करते हैं, खिलखिलाने को भी। पलकों के झुक जाने को, होठों के मुस्कुराने को और कुछ भी न बोल पाने को भी ये शब्द हमें मजबूर कर देते हैं.
फिल्मी दुनिया से जुड़े पुरुष गायकों में यह सर्फ जिन चुनिंदा लोगों को हासिल है, उनमें पंकज उधास भी आते हैं- ऐसा हमारी जानकारी में कम से कम नहीं है। केए...
पूर्वी पाकिस्तान के जो बाद में बांग्लादेश बना, नागरिकों को पश्चिमी पाकिस्तान खास तौर पर वहां की पंजाबी कम्युनिटी किसी भी...
वैलेंटाइन तो सूली चढ़े शरीरी प्रेम की वकालत में। लेकिन मीरा? मीरा को उम्र भर अदेखे प्यार की सजा मिली और आज भी, इक्कीसवीं...
'लोहे के पंख' जैसा उपन्यास हिन्दी को देने के बावजूद जो राजनीति का शिकार हो गया, जो दाने-दाने को तरस गया, जिसे लोग भूल चु...
सबसे अच्छी रचनाएं अभी लिखी नहीं गयीं। वे अब भी गर्भस्थ हैं। वे लड़ रही हैं बाहर आने की जंग। लेकिन उन्हें सरोगेसी (कोख की...
अरुण रंजन जैसा पत्रकार इस तकलीफदेह बीमारी में भला क्या सोचेगा? क्या सोच सकता है? वह सोच रहा होगा:इतने दीवाने कहां से मेर...
सरसों के फूलों से भर देता हूं आंचल यह पीलापन रखना याद लो ऐसी वेला के लिए तुम्हें देता हूं मौसम का पहला उन्माद।।
हम उस अरुण रंजन से मिलने जा रहे जो बीमार हैं। जिन्हें लकवे का हमला झेलना पड़ा और जिनकी याददाश्त साथ नहीं दे रही। वह ठीक...
दरवाजा खुल चुका है। हम सीढ़ियां चढ़ रहे हैं। अरुण जी का कमरा बदल गया है। अब वह ऊपर के फ्लोर पर रहते हैं। उनकी गर्दन में...
पटना में होंगे ढेर सारे परसादी लाल। इन तीन- चार महीनों में हम इतना तो जान गये हैं कि निश्चित तौर पर होंगे। अलग- अलग रूपो...
- आयेगा न। काशी तीन लोक से न्यारी। वहां अयोध्या नहीं है लेकिन लंका है। लंका में एक बड़ा भारी स्कूल है। दुनिया भर के बच्च...
कभी यह इलाका जंगल हुआ करता था। शेर, भालू, रीछ और जाने कितने कितने जीव- जंतुओं का स्थायी घर। जंगल में जाने की जिद अगर किस...
अलबत्ता भला हो उन लड़कियों का जो स्कूल मे़ं अंधाधुंध लाठीचार्ज की ज़द में घिरे हम जैसे सुकुमारों को देख कर लोर चुआतीं। क...
होगी! ज़रूर होगी तुम्हारी कोई न कोई तस्वीर हमारे पास। किसी जंगखुर्दा आलमारी, दीमकों की भेंट चढ़े किताबों के किसी बंडल, क...