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1971 युद्ध: बलवंत सिंह ने जोंगा जीपों से खदेड़ी पाक सेना, बाड़मेर में लगेगी मूर्ति

प्रदीप बीदावत प्रदीप बीदावत 37

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (India-Pakistan War) में बाड़मेर (Barmer) के ठाकुर बलवंत सिंह (Thakur Balwant Singh) ने भारतीय सेना (Indian Army) की मदद से पाकिस्तानी सेना (Pakistani Army) को खदेड़ा था। 13 दिसंबर को बाड़मेर में उनकी मूर्ति का अनावरण होगा।

HIGHLIGHTS

  1. 1 बलवंत सिंह ने 1971 के युद्ध में भारतीय सेना की मदद की। उनकी जोंगा जीपों की आवाज से पाकिस्तानी सेना घबरा गई। बाड़मेर में 13 दिसंबर को उनकी मूर्ति का अनावरण होगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और डिप्टी सीएम दीया कुमारी कार्यक्रम में शामिल होंगी।
1971 yudh balwant singh ne jonga jeepon se khadedi pak sena barmer mein lagegi murti
1971 युद्ध: बलवंत सिंह की जोंगा जीप

बाड़मेर: 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (India-Pakistan War) में बाड़मेर (Barmer) के ठाकुर बलवंत सिंह (Thakur Balwant Singh) ने भारतीय सेना (Indian Army) की मदद से पाकिस्तानी सेना (Pakistani Army) को खदेड़ा था। 13 दिसंबर को बाड़मेर में उनकी मूर्ति का अनावरण होगा।

यह कहानी है उस समय की जब भारतीय सेना धोरों में रास्ता भटक गई थी और लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह को मदद की तलाश थी। ऐसे में ठाकुर बलवंत सिंह ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की बात कही थी।

उनकी असाधारण बहादुरी और स्थानीय ज्ञान ने 1971 के युद्ध में भारत की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब बाड़मेर में उनकी प्रतिमा स्थापित करके इस महान योद्धा को श्रद्धांजलि दी जा रही है।

लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह से मुलाकात

भारत-पाकिस्तान के 1971 के युद्ध के दौरान, लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह के नेतृत्व में भारतीय फौज बाड़मेर के रेतीले धोरों में आगे बढ़ने में कठिनाई महसूस कर रही थी। उन्हें लगा जैसे वे दुश्मन क्षेत्र में रास्ता भटक गए हों और स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी।

ऐसी विकट परिस्थिति में, कर्नल भवानी सिंह ने कुछ जवानों को साथ लेकर बाखासर गांव का रुख किया। वे सीधे ठाकुर बलवंत सिंह के घर पहुंचे, जहां उन्होंने अपनी समस्या और भारतीय सेना की जरूरतों को विस्तार से बताया।

ठाकुर बलवंत सिंह ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया, “आप सुझाव बताएं, मेरा सिर भी देश के लिए कुर्बान हो जाए तो चिंता नहीं।” उनके ये शब्द देश प्रेम और बलिदान की भावना को दर्शाते थे।

बलवंत सिंह ने भारतीय सेना की हर संभव मदद करने का वादा किया, जो उस समय सेना के लिए एक बड़ी राहत थी। यह मुलाकात युद्ध के महत्वपूर्ण मोड़ों में से एक साबित हुई।

बलवंत सिंह की स्थानीय जानकारी और रिश्तेदारी

ठाकुर बलवंत सिंह के पोते रतन सिंह बताते हैं कि उनके दादा बलवंत सिंह की पाकिस्तान के सिंध प्रांत के अमरकोट में गहरी रिश्तेदारी थी। इस वजह से उनका सीमा पार के इलाकों में नियमित रूप से आना-जाना लगा रहता था।

बलवंत सिंह को सीमा पार के दुर्गम इलाकों, रास्तों और वहां के लोगों की पूरी जानकारी थी। उन्हें कच्छ (गुजरात) के रण की भी विस्तृत जानकारी थी, जो युद्ध के दौरान रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

1971 के युद्ध के हर मोर्चे की बहादुरी और क्षमताओं के बारे में उन्हें काफी कुछ पता था। उनकी यह जानकारी भारतीय सेना के लिए किसी खजाने से कम नहीं थी, जिसने उन्हें दुश्मन के इलाकों में प्रभावी ढंग से आगे बढ़ने में मदद की।

युद्ध से पहले की रणनीति

लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह ने युद्ध शुरू होने से पहले ही बाखासर जाकर ठाकुर बलवंत सिंह के साथ एक गोपनीय और अहम बैठक की थी। इस बैठक में दोनों ने मिलकर दुश्मन को मात देने की विस्तृत रणनीति बनाई।

लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह और दादा बलवंत सिंह के बीच गहरी समझ विकसित हुई। बलवंत सिंह की स्थानीय जानकारी और भवानी सिंह की सैन्य रणनीति का मेल भारतीय सेना के लिए एक शक्तिशाली हथियार बन गया।

छाछरो पर कब्जे का अभियान

रतन सिंह के अनुसार, 1971 में पाकिस्तान के छाछरो पर कब्जा करने के लिए जयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने एक बड़ा अभियान चलाया था। इस अभियान में 11 इन्फैंट्री डिवीजन, 330 ब्रिगेड, 85 ब्रिगेड, 31 ब्रिगेड, 17 ग्रेनेडियर्स और 10 पैरा एस एफ कमांडो जैसी कई महत्वपूर्ण सैन्य इकाइयां शामिल थीं।

6 दिसंबर 1971 की शाम 6-7 बजे भारतीय सेना ने पाकिस्तान की ओर कूच किया। युद्ध का बिगुल बजते ही पहले से तैयार रोडमैप का पालन करते हुए, भारतीय सेना ने तेजी से पाकिस्तान की सरजमीं में प्रवेश किया।

ठाकुर बलवंत सिंह बाखासर भी इस महत्वपूर्ण अभियान में भारतीय सेना के साथ थे। इसी दौरान, छाछरो में पहुंचने पर युद्ध के मोर्चे पर रेतीले धोरों में भारतीय सेना का सामना पाकिस्तान की टैंक रेजिमेंट से हुआ, जो एक बड़ी चुनौती थी।

जोंगा जीप का अनोखा प्रयोग

इस निर्णायक क्षण में, लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह ने ठाकुर बलवंत सिंह को सेना की एक बटालियन और 4 जोंगा जीप सौंप दी थीं। यह एक असाधारण निर्णय था, जिसने युद्ध का रुख पूरी तरह से मोड़ दिया।

रतन सिंह बताते हैं कि लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह और ठाकुर बलवंत सिंह ने मिलकर एक अनूठी रणनीति अपनाई। उन्होंने आर्मी की जोंगा जीपों के साइलेंसर खोल दिए, जिससे उनकी आवाज कई गुना बढ़ गई।

साइलेंसर खुलने के बाद इन जीपों की आवाज इतनी प्रचंड हो गई कि वे किसी भारी टैंक रेजिमेंट की तरह गरजने लगीं। यह आवाज रेगिस्तान की शांति को चीरती हुई दूर तक गई।

सामने मौजूद पाकिस्तानी सेना को लगा कि भारत की पूरी टैंक रेजिमेंट उन पर हमला करने आ चुकी है। इस मनोवैज्ञानिक दबाव और भ्रम के कारण पाकिस्तानी सेना में भगदड़ मच गई और वे डरकर तितर-बितर हो गए।

भारतीय सेना ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और तुरंत हमला करते हुए पाकिस्तानी आर्मी को खदेड़ दिया। इस बहादुरी और सूझबूझ के परिणामस्वरूप, भारतीय सेना ने छाछरो तक तिरंगा फहरा दिया और उस पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया।

युद्ध के बाद सम्मान और पहचान

पाकिस्तान पर इस शानदार विजय के बाद, भारतीय सेना की 10 पैरा रेजिमेंट ने युद्ध के मैदान में ठाकुर बलवंत सिंह की असाधारण बहादुरी और उनकी रणनीतिक सूझबूझ की विशेष तौर पर सराहना की। उनके योगदान को भारतीय सेना ने खुले दिल से सराहा और सम्मान दिया।

यह भी सामने आया कि ठाकुर बलवंत सिंह पर पहले मर्डर और किडनैपिंग जैसे कई मुकदमे दर्ज थे। लेकिन उनके देश सेवा और युद्ध में दिए गए अमूल्य योगदान के सम्मान में, इन सभी मुकदमों को वापस ले लिया गया।

उनके योगदान का सम्मान करते हुए, भारत सरकार ने बलवंत सिंह को पूरे देश में अपने साथ हथियार रखने के दो विशेष लाइसेंस भी जारी किए। यह उनके प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक था।

साल 1991 में ठाकुर बलवंत सिंह का निधन हो गया, लेकिन उनकी बहादुरी की कहानी और 1971 के युद्ध में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है। उनका नाम भारत के उन गुमनाम नायकों में शुमार है, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

बाड़मेर में मूर्ति अनावरण समारोह

ठाकुर बलवंत सिंह की स्मृति में बाड़मेर के बाखासर स्थित बलवंत चौक पर उनकी भव्य मूर्ति स्थापित की गई है। 13 दिसंबर को इस मूर्ति का अनावरण समारोह आयोजित किया जाएगा, जो एक ऐतिहासिक पल होगा।

इस गरिमामय कार्यक्रम में देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और राजस्थान की डिप्टी सीएम दीया कुमारी जैसी कई प्रमुख हस्तियां शामिल होंगी। यह समारोह बलवंत सिंह की बहादुरी और देश के प्रति उनके अद्वितीय समर्पण को सच्ची श्रद्धांजलि देगा।

कार्यक्रम में आने वाले हजारों लोगों की सुविधा के लिए एक विशाल डोम बनाया जा रहा है, ताकि सभी लोग आराम से इस ऐतिहासिक और गौरवशाली पल का हिस्सा बन सकें। यह आयोजन न केवल बाड़मेर बल्कि पूरे देश के लिए एक गर्व का क्षण होगा, जो हमें अपने नायकों की याद दिलाएगा।

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