जयपुर | वैसे तो वन्दे भारत ट्रेन अपनी स्पीड की वजह से फेमस है। परन्तु यदि हम बसवा गांव पहुंचें तो पता चलता है कि यहां इस ट्रेन को अपनी गति धीमी करनी पड़ती है। वह भी तब जब इस ट्रेन में रेल मंत्री और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन भी बैठे हों। तो भी यह अपनी स्वाभाविक गति से नहीं चल सकती। यहां प्रत्येक ट्रेन को धीमा होना ही होता है। इसकी वजह बेहद खास है।
महाराणा सांगा का चबूतरा: यह कोई स्टेशन नहीं है फिर भी वन्दे भारत भी यहां होती है धीमी
यह बसवा गांव स्थित राणा सांगा का चबूतरा है। यह वह ऐतिहासिक चबूतरा है जो राणा सांगा की अंतिम लीला स्थली कहा जाता है। चबूतरे के एक कोने से रेलवे ट्रेक की दूरी मात्र पांच फीट ही है। ऐसा भारत में बहुत कम जगह देखा जाता है कि इस तरह से ट्रेक के समीप इतनी कम दूरी में कोई निर्माण हो।
HIGHLIGHTS
- यह बसवा गांव स्थित राणा सांगा का चबूतरा है। यह वह ऐतिहासिक चबूतरा है जो राणा सांगा की अंतिम लीला स्थली कहा जाता है।
- चबूतरे के एक कोने से रेलवे ट्रेक की दूरी मात्र पांच फीट ही है। ऐसा भारत में बहुत कम जगह देखा जाता है कि इस तरह से ट्रेक के समीप इतनी कम दूरी में कोई निर्माण हो।
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वजह ऐतिहासिक है। यह बसवा गांव स्थित राणा सांगा का चबूतरा है। यह वह ऐतिहासिक चबूतरा है जो राणा सांगा की अंतिम लीला स्थली कहा जाता है। राणा सांगा के निधन के बाद ही देश में मुगल साम्राज्य स्थापित हुआ था। इसी वजह से इस चबूतरे का ऐतिहासिक और लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ महत्व है।
ऐसे में इसे बचाने के लिए रेलमार्ग ही मोड़ा गया है। एक कर्व बनने केकारण यहां कोई भी ट्रेन हो उसकी गति धीमी करनी पड़ती है। जब हम राणा सांगा के चबूतरे पर पहुंचे तो यहां मिले कई लोग ये लोग महाराणा सांगा की जयंती की तैयारियां कर रहे थे।
यह आयोजन 14 अप्रैल को किया जाना है। इसमें बतौर मुख्य अतिथि मेवाड़ पूर्व राजपरिवार के सदस्य और राणा सांगा के वंशज लक्ष्यराज सिंह शिरकत करेंगे। इस आयोजन की तैयारियों में ग्रामीण जुटे हुए हैं। यहां हमें मिले शक्ति सिंह बांदीकुई।
उन्होंने बताया कि इस जगह को तैयार करवाया जा रहा है। यहां एक हाॅल निर्माण केलिए भूमि पूजन किया गया है। यह चूबतरा तोड़ने के आदेश हुए थे, लेकिन गांव वालों ने एक लम्बी लड़ाई लड़ी।
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इसमें तत्कालीन सरपंच समेत तमाम गांव वालों की आस्था और विश्वास के साथ महाराणा सांगा के आशीर्वाद से ही वे रेलवे से जीत पाने में सफल हो सके। यह लड़ाई 2006 में शुरू हुई।
लोगों के मुकदमे भी लगे, लेकिन जनता जुटी और डटी रही। किसी भी डर, प्रलोभन आदि से डरे बिना उन्होंने अपनी पूरी मेहनत और समर्पण से इस चबूतरे को बचाने में सफलता हासिल की।
हम यहां बात कर ही रहे थे कि पता चला यहां से वंदे भारत ट्रेन गुजरने वाली है। हमने खैर-खबर ली तो पता चला कि वंदे भारत की गति भी इस जगह पर धीमी हुई और वह आगे निकली। वन्दे भारत का उद्घाटन 12 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्चुअली हरी झंडी दिखाकर किया था।
इस ट्रेन में रेल मंत्री, रेलवे बोर्ड के चेयरमैन और तमाम बड़े अफसर शामिल थे। यह जगह बसवा गांव के समीप स्थित है और लोग यहां राणा सांगा के चबूतरे पर पूजन करते हैं और अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
चबूतरे के एक कोने से रेलवे ट्रेक की दूरी मात्र पांच फीट ही है। ऐसा भारत में बहुत कम जगह देखा जाता है कि इस तरह से ट्रेक के समीप इतनी कम दूरी में कोई निर्माण हो।
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